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माँझी तोरा नाम तो बता

आज बस ये चित्र जो शायद सालों बाद बनाया है और मेरे पसंदीदा ऋतुपर्णो दा का ये गीत जिसे सुनते हुए बनाया है –

शाम ढले सखियाँ सब लौट गयीं सारी

अकेले हम नदिया किनारे

माँझी तोरा नाम तो बता

फिर कैसे पुकारें ! तुझे कैसे पुकारें …

अकेले हम नदिया किनारे

टूटे मेला सावन बेला

आई जमुना किनारे

माँझी तोरा नाम तो बता

फिर कैसे पुकारें , तुझे कैसे पुकारें …

वैचारिक अराजकतावाद और हमारा समय

पता नहीं मुझे ही ऐसा लगता है या आप सबको भी की जैसे विचारों का कोई महत्व नही तरह गया न तो किसी के पास विचारों का बोझ सह सकने की क़ुव्वत रह गयी है ना ही इतना समय सब बस अपनी तात्कालिक जरूरतों और फिलहाल के मुद्दों पर अपनी राय बनाने में जुटे हुए हैं ।बहरहाल कुछ लोग तो हम जैसे जरूर ही होंगे जो इस परिदृश्य में नैतिकता विचार और मूल्यों को ढूंढते होंगे और बेशक़ हैरान भी होंगे इस पतन पर, जहां किसका क्या रंग है समझना बहुत मुश्किल हो जाता है । तात्कालिकता इतनी हावी है कि कालातीत कुछ बचा ही नहीं।

बेशक़ मैं भारतीय राजनीति के बारे में कह रही हूं। जहां विचारधारा मूल्य और नैतिकता का पतन अपने चरम पर है। मार्क्सवादी कांग्रेसी बन रहे हैं , कांग्रेसी भाजपाई और भाजपाई कांग्रेसी । सब कुछ जैसे गड्डमड्ड हो गया है। प्रियंका और राहुल अपने को हिन्दू प्रमाणित करने को परेशान हैं तो संबित पात्रा किसी बुढ़िया माई के घर जमीन पर भोजन कर रहे हैं ,समाजवादी अपनी रेडिकल सोच को परे रख विकास और नौकरी की बातें कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी नाटक के मंच पर सज्जाकार की गड़बड़ी से सबने गलत कॉस्ट्यूम डाल रखा हो।पूरा इतिहास ही जैसे उलट पुलट हो गया है ।इन सबमे सबसे ज्यादा परेशान बिचारे कांग्रेसी हैं उनका तो कुछ बचा ही नही। रहे सहे जिस परिवारवाद पर वे टिके थे एक अयोग्य व्यक्ति ने उसे पूरी तरह लुटा दिया ।

हालांकि इसे देखने का एक दूसरा पहलू भी हो सकता है जैसा कि कांग्रेस ने इंदिरा जी को मनमानी के कारण बाहर निकाल कर स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस से उनके परिवार को भिन्न कर दिया था। पर धन्य है भारत की जनता क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा।

पर एक बात जो महत्वपूर्ण है कि चुनाव जीतने के लिए ही सही दलित को राष्ट्रपति बनाना सबके विकास की बात करना और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की बातें कहीं न कहीं यही प्रमाणित करती हैं कि पार्टी चाहे कोई भी हो देश की राजनीति करने के लिए उसे कांग्रेसी विचारधारा का लबादा तो ओढ़ना ही पड़ेगा ।अब देखने की बात ये है की ये लबादा सवर्ण आरक्षण जैसे मुद्दों की लॉलीपॉप के आगे कुछ वाक़ई ऐसा कर पाती है जो वास्तव में आज की जरूरत है जैसे आरक्षण की समीक्षा । जहां जहां एक पूरी आबादी का हक़ कुछ लोग विशेष ले रहे हैं वो भी पीढ़ियों से। क्या आरक्षण की यह व्यवस्था बार बार कोसे जाने वाली जातिव्यवस्था की तरह रूढ़ ही रहेगी या इसमें भी नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे संतरण हो सकेगा ।अगर ऐसा नही हो सकता फिर काहे की प्रगतिशीलता भई !ये तो तथकथित मनुवाद से भी गयी बीती होगी। दलित विचारकों के इस कुतर्क का कि सवर्णों को उनकी संख्या के हिसाब से आरक्षण दे दिया जाय का कोई प्रतिवाद इस रूप में कर पायेगी कि आधुनिकता का दम भरना और दलितवाद की पैरोकारी करना भी उतना ही गर्हित है जितना कि जातिवादी होना ।वोटों की राजनीति जो कहती है उससे तो ऐसी किसी भी संभावना की उम्मीद कम ही है खैर वक़्त और लोक पर भरोसा रखना ही महत्वपूर्ण है। और अभी न सही सच और ईमानदारी और तटस्थता की कद्र पर कोई वक़्त तो होगा ही जब तात्कालिकता की यह मैल बैठ जाएगी और जनता सच को खुली आँखों से देख और समझ पाएगी

बहरहाल लगता तो यही है की हमारा देश गांधी की विचारधारा से बहुत दूर निकल आया है जहां साधन की पवित्रता का कोई मतलब नहीं है असल मतलब साध्य का है पर नाउम्मीदी के लिए एक जिंदा वक़्त में कोई जगह नहीं होती।आज की शाम इसी उम्मीद में की ये वक़्ती जोश हमें अपने होश से बेखबर न रखे। आधुनिकता ने हम जैसो को जिन्हें हमारी मध्यकालीन परंपरा और दक्षिणपंथी विचारक यहां तक कि महान उग्रवादी विचारक तिलक तक घर की चहारदीवारी तक सीमित रखने का विचार रखते थे उनसे सहजता से जुड़ाव को असंभव बनाती है। धर्म और नैतिकता की अवधारणा को जिस तरह विचारकों का यह वर्ग स्त्रियों से गांठ बांध देता है कोई आश्चर्य नहीं है कि कब उसका आश्रित संगठन धीरे धीरे प्राचीनता की ओट में एक जड़ व्यवस्था को थोप दे।जो वैचारिक एनेस्थीसिया की तरह समाज को कुंद कर दे।हमें ध्यान रखना चाहिए कि मध्यकालीनता कभी भी अचानक नहीं आती वो धीरे धीरे ही आती है सबकी नजरों के और इसी सामने सूरज के नीचे।

क्या आपमें से किसी ने के. दामोदरन की भारतीय चिंतन परंपरा बुक पढ़ी है ? वो मार्क्सवादी थे या कांग्रेसी यदि संभव होतो बताएं?साथ ही किसी राइट विंग के विचारक की भारतीय संस्कृति पर कोई पुस्तक हो तो जानकारी दें ?

सपने देखते हैं आप ? भई पूछने की तो बात नहीं है ये पर लोग इतना शर्माते हैं बताने में कि ऐसा लगता है उनकी नींद में सपने ही न हों । खैर अपना तो यही सपना था कि एक दिन हम भी पढ़ें और एक ऐसी डिग्री मिले की टोपी … जी जब सपना देखा था तब उसे टोपी ही समझते थे हम… खैर तब ही ये फिक्स था लगभग बी एच यू से नहीं होगा वो … कारण वो तो साफा पहना देते हैं जी ! खैर हमने बी एच यू छोड़ जिस महबूब को अपनाया वो औवल दर्ज़े का दगाबाज़ निकला न घर का छोड़ा न घाट का दो साल की मुहब्बत एम ए की डिग्री के साथ खत्म हो गयी दिल मे बस हाय जेएनयू रह गया । खैर हमे डी यू ने अपना लिया और वो भी खुले दिल से। अपनी पीएचडी चल रही है और एम फिल भी किताब की शक्ल लेने वाली है … इस प्यार में बहोत तकलीफें भी दी हैं पर किसी ने कहा ही है ‘ सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो , सभी हैं राह में तुम भी निकल सको तो चलो ‘ । फिलहाल हम तो उस टोपी की ख्वाहिश में यहां तक आ गए …आज आप की दुआएं अपने लिए मांग रही… बाकी आप सब भी अपने सपनो की फेहरिस्त दे सकते हैं हमारी भी दुआ रहेगी ऊपरवाला उन्हें पूरा करे … आज सिर्फ अपने साथ वालो के लिए दुआएं की वो अपनी मंजिलों को पहुंचें आमीन !

और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा – फैज़ अहमद फैज़

प्यार शायद दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द है , पर इसकी ख़लिश उसे झेल पाना सबसे मुश्किल काम ! इसीलिये तो फैज़ ने भी कह डाला –

और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।

पर शायद कोई ग़ालिब ही होगा जिसमे इस चुभन को भी इतने ख़ुलूस , सहजता और नफ़ासत से उठाने की क़ुव्वत हो।

ऐसी सिचुएशन को डील करते वक़्त ग़ालिब का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है आँखे नम भी हों और आवाज़ बुलंद भी।ग़ालिब का यह तरीका ही उन्हें खास बनाता है । क्या हुआ जो सामने वाला प्यार नही करता उनसे, ग़ालिब ने उसे छोड़ नहीं दिया शायद इसे ही हमारे यहां भोग और मुक्ति का मिलना कहा गया है , जहां महबूब ही वली हो जाता हो।

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा

कभी तू न तोड़ सकता अग़र उस्तुवार होता ।

कौन माफ़ कर सकता है ऐसे नाज़ुक मिज़ाज़ को ? पर ग़ालिब वो ऐसे वक्त भी उसे उसकी तोहमत नही लगाते ।वो एक साथ ही प्यार में भी हैं और प्यार के बाहर भी ।जिस नाज़ुकी को वो प्यार करते हैं वही उस रिश्ते को तोड़ भी डालती है पर ग़ालिब वो जानते हैंकि ये नाज़ुकी या चंचलता ही है जो उन्हें लुभा रही है और उसे ठहराते ही वो खत्म हो जाएगी ,प्यार का वो क्षण ही तभी तक है या तो प्यार की वजह खत्म हो जाएगी या प्यार का रिश्ता !जो इतना चंचल है और इसीलिए खूबसूरत भी वो क़ैद में रहेगा भी नहीं।

पर जो हो प्यार वो कर भी उसी से सकते हैं।बहरहाल !तब तक ग़ालिब की ग़ज़लों की गहराई में आप भी कुछ गोते लगाएं बेशक़ ! ग़ालिब आपको निराश नहीं करेंगे ।आज इसी दुआ के साथ कि ऊपरवाला हममें दूसरों की भावनाओं को समझने की भी क़ुव्वत बख्शे आमीन !

कलम के साथ ही हमने कूँची भी उठा ली थी तब पता नही था ये राह इतनी मुश्किल होगी।खैर कूँची तो वक़्त की धूल में गर्द खा गयी पर क़लम ने अब तक साथ नहीं छोड़ा ।फेसबुक पर डाले आठ साल हो गए बनाये हुए दस साल । कुछ चित्र आप सब के लिए भी।

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाक़ाम ही तो है , लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है – फैज़ अहमद फैज़

आदमी की एक फितरत होती है कि उसे बड़ी चीजें ही लुभाती हैं। बड़ा घर, बड़ी तनख्वाह, बड़ी गाड़ी और बड़ा सबकुछ पर जी ये बड़ापन कहीं आसमान से टपकता है क्या ?मसलन हम किसी बड़े पेड़ को देखकर सराहते जरूर हैं उसके मीठे फल हम निचोड़ डालते हैं पर उसका बीज? उसके साथ क्या करते हैं ?जी आप कहेंगे बेतरह पागलपन है !टूटा हुआ बीज किस काम का ? कचरे में ही तो जाना है उसे !

बस्स! यही है इंसान की फितरत । हमारे ज़ेहन में ये कभी नहीं आता कि बिना टूटे कोई बीज पेड़ नहीं बनता ! बिना विनाश के कोई सृजन नही होता और बिना मृत्यु के कोई जीवन नही होता ।

तब तक अपने आस पास मिलने वाले हर टूटे बीज को ( जी टूटे हुए इंसान भी बीज ही होते हैं ) आपकी तवज्जोह मिले इसी दुआ के साथ आमीन!

कुंद संवेदनों के हाथ

क्या हो , जो इंकार कर दें

बढ़ने से,

शतरंज के मोहरे,

जिसे बिठाते हो,

चलाते हो,

और कभी

हार भी जाते हो।

बदलने, बढ़ने

छोड़ने की पीड़ा

नहीं पहुँचती

उन दिमागों तक

जिनके हाथ की नसें

जवाब दे चुकी हैं

पीड़ाओं के,

संवहन को।

पर साहब जी !

विनती है एक

ये चौकोर खाने

आपके लिए हैं

खेल की बिसात ,

जिसमे हैं , हार और जीत

चित या पट

पर जी !

बस एक बार

महसूसना कभी

मर जाते हैं जो मुहरे, बेनाम

उनके भी अपने खाने होते हैं

और उस चौकोर चौहद्दी को

लांघना

केवल खेल नहीं होता।

हथेली की छाया

मुझे डर लगता है

कि जमाना है बड़ा ख़राब

इस ओर से भी

उस ओर से भी

बचाने को है

मेरे पिता की

बस एक छोटी सी हथेली

जिसमे बराबर हैं नसीहतें

और थोड़ी डांट भी,

वैसी जिसमें शब्द नहीं होते

सिर्फ होती हैं , थोड़ी त्योरियां

बहकते हर कदम को अपने

रोक लेती हूं मैं

कि मैं जानती हूं

कितनी छोटी है ये दुनिया

और फैलते- फैलते

मेरे पिता का कलेजा

आखिर कितना नाव बनेगा

और पतवार अपनी

थामनी ही होगी

आज या तो कल

पर डर और दहशतें

मजबूत नहीं होने देतीं

अपनी पकड़ , पतवार पर !

आखिर इनकार तो नहीं कर सकती

उस डर से

जो मां के दूध के साथ

घुल जाता है रगों में

हर लड़की के

पर जानती हूं कहीं भीतर

डरना किसी दर्द का इलाज़ नहीं है

बल्कि उसका हल

दहशत के अंत में है।