Being emotional and being fool are two different things unless you mix it and end up being an emotional fool.

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कस्तूरी कुंडल बसै , मृग ढूंढे वन माहिं

संसार की सभी क्रांतियों में सबसे अहम क्रांति शायद अपने आप को स्वीकार कर पाना है, अपने अक्खड़पन,अनगढ़पन और तमाम मुलायमियत में और इस अद्वितीयता के आनंद को जी पाना है वर्ना तो पूरी ज़िंदगी एक अनजानी दौड़ के घोड़े की तरह दौड़ को जीतने की कोशिश में निकल जानी है।

और फिर ऐसा इंसान जो खुद को ही न स्वीकार सके उससे दूसरों को पहचानने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है।आज की शाम इसी उम्मीद में की हम सब जिंदगी की गहमागहमी के बीच अपनी पुरखुलूस रूह को महसूस कर पाएं आमीन!

मंज़िलों की आरज़ू

आज सिर्फ शक़ील आज़मी का ये शेर

अपनी मंज़िल पे पहुंचना भी खड़े रहना भी ,

कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़ा रहना भी।

वाक़ई सिर्फ बड़ा बनना जरूरी नही बल्कि उस बड़प्पन को बनाये रख पाना भी एक चुनौती है ।

प्रतिशोध की मानसिकता और हम

गुस्सा और दुख कभी कभी खुद उस इंसान के लिए तकलीफदेह बन जाते हैं जिसके अंदर रहते हैं इसलिए उससे जितनी जल्दी निज़ात पा ली जाए उतना बेहतर है।

कितनी अज़ीब बात है ,हमें यह लगता है कि जो हमारे साथ बुरा कर रहा है हम उसका ऐसा अहित करें कि वो बस खत्म हो जाए पूरी तरह।उसे ऐसी चोट पहुचाएं कि वो बस चित पड़ जाए।

लेकिन यदि ग़ौर करें तो लड़ना ,खत्म करने की प्रक्रिया नही है बल्कि मज़बूत करने की प्रक्रिया है।हम जिससे लड़ते हैं वह उस पल भले ही हार जाए पर हमारे अवचेतन में कही गहरे धंस जाता है , उससे हमारे मानसिक बंधन गहनतम होते जाते हैं,पर वह समाप्त तो नहीं ही होता बल्कि प्रबलतर होकर जन्म लेता है।रक्तबीज की तरह असंख्य, अगणित अनेकानेक रूपों में।

इसलिए अगर कोई नकारात्मक व्यक्ति आपसे जुड़ जाए तो उससे प्रतिशोध की सर्वोत्तम युक्ति अपने मानसिक जगत से उसके अस्तित्व का पूर्णतः विलोपन है , मानसिक वाचिक और व्यवहारिक सभी रूपों में।

हौसला और ज़िन्दगी

यूँ तो जब तक सांसे चलती रहें इंसान जिन्दा ही समझा जाता है पर बिना किसी चाह,हौसले और कुछ बेहतर कर गुजरने की तमन्ना के जीना भी कोई जीना है।पर कभी कभी असफलता हमें सचमुच इतना तोड़ देती है कि हम कहीं भीतर ही मर जाते हैं।लेकिन टूटना और फिर उन टूटे हुए टुकड़ों से ही खुद को जोड़कर खड़ा करना और जिंदगी की लड़ाइयों के एक नए दौर के लिए निकल पड़ना ही असल मे जीना है ।

आखिर एक ज़िन्दगी को इस दुनिया में लाने के लिए ऐसी ही कोई एक रूह , मृत्यु जैसी मर्मान्तक पीड़ा सहती है फिर उसकी इस कोशिश को धता बताकर हार मान लेने वाले हम होते कौन हैं, ऊपरवाले की तरह यहां ज़मीन पर भी एक शख़्सियत ऐसे टूटे हुए लोगों को जोड़ने की ताक़त रखती है,और हम उसे माँ कहते हैं,मुनव्वर राना जी का शेअर पेशे ख़िदमत है-

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।

देरी के लिए…

पी एच. डी अपने आप में बड़ी उलझाने वाली चीज है फिलहाल उसके एक हिस्से को पूरा करने की जद्दोजहद के बीच ब्लॉग नहीं लिख पायी ।ख़ैर आगे अपडेट जल्दी और बढ़िया करने की कोशिश रहेगी।इस बीच भी मेरी पोस्टस को पसंद करने और प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से शुक्रिया।

ये ब्लॉग मेरी आगामी पुस्तक का हिस्सा होंगे पर अपने करीबियों और गुरुजनों की बजाय मैं इस बार अनजान लोगों साहित्य प्रेमियों से जुड़ना चाहती थी। ये ब्लॉग उसी क्रम का हिस्सा है साथ ही उर्दू का लगाव भी मुझे यहाँ ले आया।बहरहाल एक बार फिर से आपको धन्यवाद।

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासे:,कोई चारसाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता।

जी ग़ालिब हैं कि यहां भी हाज़िर हैं।आजकल की दोस्ती , इंसान बाज़ आये ऐसी दोस्ती से ।चलिए आप से ही पूछती हूँ जो कोई ग़मगीन हो तो क्या करना चाहिए? उसकी गलतियां गिनानी चाहिए , यूँ न करते तो ये ना होता,तुम्हारी आदतों का सब अंजाम है,और न जाने क्या क्या…आप दोस्त न हुए काउंसलर हो गए ,कोई जो गरचे देखे तो यूँ आपको वक़ील भी समझ बैठे ,पर दोस्त ??ना वो तो ऐसे नहीं हो सकते।

दोस्ती की इस पोस्टमॉडर्न सोच से ज़रा बाहर निकलें और ग़ौर करें।एक ग़मगीन शख्स क्या चाहता है अपने दोस्त से ?

ग़लतियाँ करने वाला शख्स गर गमख़्वार है तो बहुत मुमकिन है उसे उसकी ग़लतियाँ खुद ही पता हैं,अपनी कमियां अपनी कमजोरियां बाकायदा।

ग़रचे दोस्त कुछ और ही चीज़ होते हैं ,शायद वो क़ीमती शख्स ,वो लख्ते ज़िगर, जो आपकी टूटती – लरज़ती रूह को घनी छाँव की मानिंद सींच दे,जिनकी खुलूस की गर्माहट सिकुड़ती हुई रगों को फैला दे।जो टूटकर भी जड़ों में लगी मिट्टी की तरह चिपका रहे।दोस्त शायद उसे ही कहते हैं।

माना कि यूँ दोस्त मिलना ज़रा मुश्किल है पर नामुमकिन तो नहीं।और जो न ढूंढ पाएं ऐसा तो खुद ही ऐसा बनाने की कोशिश क्यूँ न करें।जी ऊपरवाले ने गर रूह दी है तो थोड़ा रूहानी बन जाने में कुछ बुराई तो नहीं।इसी दुआ के साथ कि ये दुनिया ऐसे लोगों से भर जाए । आमीन!!

अहरनि रहे ठमूकडा,जब उठि चला लुहार

नायाब चीजें शायद अकेली ही होती हैं।यूँ तो हर हीरे को जौहरी की दरकार होती है, पर कभी कभी जीते जागते इंसान भी एक ऐसे ही जौहरी की दरकार में अपनी तमाम नेमतों को छुपाये बस पल -पल गर्क होते रहते हैं। हम इस दुनिया में जैसे आते हैं, वैसे ही चले जातें हैं, कहानी के एक आम प्यादे की तरह!बस बीच की ये खाली जगह हम भरते हैं। रंगीन धागों की तरह खिंचते ,बढ़ते ,चढ़ते और रंगते-

झीनी झीनी बीनी चदरिया

पर इसी उधेड़ने बुनने में कब जिदगी की उसी रंगीन चादर के नीचे पहुचने का वक़्त आ जाता है पता भी नहीं चलता।

आपको क्या लगता है ?क्या सचमुच इतना मुश्किल होता है खुद को पहचान पाना?अपनी अहमियत , अपनी कद्र और अपनी खासियत इसके पहले की ज़िन्दगी का सूरज अपनी शाम को पहुँच जाए फिर तो चाहे कितनी भी ख्वाहिश हो, क्या फायदा? सँवारने वाला लुहार ही जब चलने को उठ पड़ा हो, कबीर भी तो कहते हैं-

‘अहरनि रहे ठमुकडा जब उठि चला लुहार’

इसलिए जिस पल ऐसा लगे कि कुछ है खुद के भीतर कुछ ऐसा है जो सुंदर है , प्यारा है ,और आपकी अपनी आवाज़ है तो फिर ये जो आप बार – बार ख़ुद पर शक़ करते हैं ना ?उसे झटक कर बैठ जाइए उसे बुनने पिरोने और कुछ खास बनाने में।ज़िन्दगी ऊपर वाले का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है और आप खुद उसकी सबसे सुंदर कृति । दीपों की जलती हुई अवली जैसे अमावस के अंधेरे और हवाओं के बीच भी अपनी गुंदुमि , दूधिया और लपलपाती रौशनी से ही सही लोहा लेती हुई जलती रहती है वैसे ही आप भी अपने भीतर की रौशनी को यूँ ही जलाये रखें, अविरत और कर्मप्रसु बन कर ,इसी आशा के साथ-‘दीपावली की ढेर सुभकामनाएँ ‘आप सभी को!

या रब जमाना मुझ को मिटाता है किसलिए, लौह ए जहाँ पे हर्फ़ ए मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

कितनी टूटन है इन लाइनों में और दर्द ऐसा जैसे किसी तरोताजा,धड़कते हुए दिल को कोई तेज़ चीज़ चीर जाए। आख़िर ग़ालिब बनना इतना आसान भी तो नहीं।

ज़माने से इतनी शिकायत ! आख़िर क्योंकर जबकि हम खुद उसके ही टुकड़े हैं।पर जी!जो नम आंखे और जज़्बाती दिल रखते हैं, उनकी रूहें देखकर ख़ुदा भी एकबार गमख़्वार हो जाए । इतना आसान कहाँ होता है ऐसे जीना।एक शीशे का दिल , ख़्वाब भरी आंखें और नर्म जज़्बात वाली रूह आखिर चटकती,सूखती,झुलसती नहीं तो यूँ बोल भी तो नहीं पाती।इस बेजान, खुरदुरी, सख्त और बेरंग दुनिया का दिल होते हैं ऐसे लोग।तो जी बस्स! दिल को यूँ ही संभालिये। किन्ही आंखों की तरावट पढ़ डालने,और चेहरे की शिकन से रूह की तासीर जानने की अदा कोई पत्थरदिल क्या जाने और ख़ुदा की इस नेअमत को खुले दिल से अपना लीजिये जिंदगी आसान न सही खूबसूरत तो हो ही जाएगी इस दुआ के साथ। आमीन!

उम्र -ए -दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन ,दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में

इंसान पूरी ज़िंदगी जिस एक चीज़ की ख़्वाहिश में काटता है वो शायद ‘एक मुक़म्मल भरोसा’ होता है एक ठहराव एक स्थाईपन पर दुनिया में शायद यही सबसे मुश्किल चीज़ है। क्योंकि ये शुरू ही वहां से होती है जहाँ ठहराव खत्म हो, रुकना ही यहाँ मौत है।सबकुछ बदल सकता है लोग, रिश्ते,नाम, शोहरत,पैसा कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप यकीनन अपना कह सकें।कुछ भी हो सकता है बस एक पलक के झपकने में।

आप कहेंगे बस्स!इतनी सी बात।ये तो सबको पता है।तो जी आप मुग़ालते में हैं।क्योंकि कहना एक बात है और उसे महसूस करना दूसरी।बहोत बार कहने और कर पाने की दूरी पूरी एक उम्र का फासला बन जाती है और जब चीजें सच मे हाथ से फ़िसल जाती हैं तो चाहे अनचाहे ये कड़वा सच जहन में बैठ पाता है।

खैर ये तो बड़ी बड़ी बातें हो गयी जी!बस्स कभी कभी छू जाती हैं कुछ लाइनें बेसाख़्ता और बेतावज्जो भी दिमाग में अपना घर बना लेती हैं ये लाइनें भी कुछ ऐसी ही हैं-

उम्र ए दराज़ मांग के लाये थे चार दिन

दो आरजू में कट गए तो इंतजार में।