तर्क-वितर्क-कुतर्क

तर्क वितर्क और कुतर्क हिंदी के तीन अलग- अलग शब्द हैं, पर आजकल हमारी जमात के हिंदी पढ़े-लिखे लोग शब्दों के अर्थ को प्रचलन के आधार पर प्रयोग नहीं करते बल्कि अपने प्रयोग के आधार पर प्रचलित करने में विश्वास रखते हैं।वे प्रायः तीनों को समानार्थी मानकर प्रयोग करते हैं ,करें क्यों न आजकल सबकुछ को कूट-पीसकर समान बनाने पर बहुत जोर जो है तो बुरा क्या है अगर वो तीनों पर बराबर बल दे रहे हैं ।ख़ैर अब आपको ये सब बेसिरपैर न लगे इसलिए बता दूं कि आज शिक्षक दिवस है और हम बराबर उसी की बात कर रहे हैं।

भई ये अपराधी सा दिवस क्यों किसी ने चिपका दिया? पर जो भी हो ,जिसने चिपकाया उसने तो भई नया काम ही किया, अगले ने उसकी जड़ खोद दी,लो भई ये तो उससे भी ज्यादा नया काम किया और आखिर जिसने उसमें मट्ठा डालने की कोशिश की उसने भी कुछ तो नया ही किया ना?पर अब …कब तक मट्ठा डालोगे ? कई लोग उसकी जगह कुछ नया चिपकाना चाहते हैं ये पहले वालों से कुछ बहुत अलग लोग नहीं हैं और कुछ तो उनके चिपकाने के पहले ही मट्ठा लेकर खड़े हैं बस इसीलिए हमको ये उखाड़ना और चिपकाना दोनों बराबर किस्म का ड्रामा लगता है।कभी पढ़ा था ‘अंधों का हाथी’ बिल्कुल वैसा ही , किसी को दूसरे की सुननी नहीं है।

खैर समस्या उनके लिए है जो इस ड्रामे में न कलाकार है,न प्रेक्षक न लेखक और बहुत हद तक समीक्षक भी नहीं ,वो क्या करें ? हम जैसे उसी में आते हैं ,भई !हम सब जानते हुए भी मनाना चाहते हैं।जैसे अपने अपने राम वैसे अपने अपने तुलसी बाबा! फिर भई वो तो सबके लिए रास्ता देते हैं हमें भी मिल ही गया- ‘जलज जोंक जिमि जल बिलगाहीं’।

रही हमारी बात तो हम इटेंशनली जलज नहीं हो रहे इसका ठोस कारण भी है । स्कूल ,कॉलेज या यूनिवर्सिटी सहपाठी चाहे जैसे मिले हों शिक्षक हमेशा ही बेहतरीन मिले।उनसे हमेशा मार्गदर्शन और प्रेम मिला।मेरी तमाम बचकाना हरकतों और सीमित ज्ञान के बावजूद उन्होंने मुझे वो बनाया जो आज हूँ।अच्छी याददाश्त के चाहे जो साइड इफेक्ट्स हों फायदा यह है कि आज भी जब पुराने नोट्स पलटती हूँ तो उनकी आवाज में ही वो शब्द सुनाई पड़ते हैं और उनमें छुपे अर्थ आज भी बड़ी -बड़ी किताबों में खुलते हैं । उन सभी शिक्षकों को तहे दिल से शुक्रिया जिनकी बदौलत हम आज लिखने,पढ़ने,बोलने और अपने विचार साझा कर सकने की हैसियत बना सके!

इंसानियत और प्रेम

बहुत बार उधेड़कर

सब फंदे ,सभी बेल बूटे

इंसानी प्यार के;

प्यार भरी सब यादों को

पलटकर

जलती धूप में निचोड़ा ,सुखाया

और तसल्ली कर ली

पर फ़िर,

बारिश की बूंदों के साथ

उतर आया ,हूबहू

कुछ यूं जैसे कभी गया ही न था।

सटकर खड़ा हो गया जैसे

दुम हिलाता नन्हा सा पपी

दुपट्टे के छोर से खेलती

कोई छोटी सी बिटिया।

कभी दफ़न कर दिया उसे,

मन के तहखानों की,

गहरी शीत भरी परतों में।

पर ,

पसीजती बूंदों की तरह

उभर आया फिर

ज्यों का त्यों।

प्यार शायद पानी की तरह है

जलता, उबलता और जम जाता है

पर कभी खत्म नहीं होता,

और शायद इसीलिए

दुनिया जिसे प्यार करती है

उसे ईश्वर कहती है ।

अपनी कुछ अगर – मगर

आगे वाला quote पता नहीं किस महापुरुष ने कहा था ,आप को पता चले तो मुझे भी सूचित करें दें- ” अगर आप किसी की निंदा नहीं कर सकते तो आपके मित्र हो सकते हैं मित्र मंडली कभी नहीं हो सकती।”और भई जिनके अगल- बगल चाटुकार मित्रों की मंडली न हो वो काहे का ज्ञानी है कि नएँ?

भई उपर्युक्त महापुरुष जी की तरह इधर भी ज्ञान की धुआँधार बारिश हो रही थी कुछ सहज प्रसार टिप्पणियों के रूप में ब्लॉग में भी भेज रही हूँ। मुझे पता है पकौड़ियाँ तलने में आप बखूबी माहिर हैं और चटनी और मसाले तो अपने आप खिंचे चले आएंगे। ये जानते हुए भी कि टिप्पणियां करने का अधिकार सिर्फ समर्थ जनों को ही शोभा देता है,इस अकिंचन ने भी कुछ प्रयास किया पर झूठ बोलने की महान कारीगरी मूढ़ों में कहाँ,इसलिए ये नहीं कहूंगी कि इन टिप्पड़ियों का मेरे जीवन से कोई लेना देना नहीं है, बाकी तो आप सब समर्थ जन हैं जोड़ने का कोई अवसर आप कृपया मत छोड़िएगा!

तो भई असल मुद्दे पर आते हैं कि हम जैसे हिंदी माध्यम वाले बच्चे जो देश के किसी कोने के किसी विद्यालय से नैतिकता और आदर्श का पाठ पढ़ कर आते हैं उन नैतिक वचनों से आगे सोचने में अक्सर दिक्कत महसूस करते हैं , उन्हें अपना पूरा एजुकेशन सिस्टम जो सिर के बल हिप्पोक्रेसी में धंसा हुआ है कभी पूरा समझ नहीं आता।ऐसे में पूरी स्थिति ही एक गर्हित उपहास में तब्दील हो जाती है।

यहाँ अगर आप प्रतिभाशाली विद्यार्थी हैं तो आपको खूब आशीष और सम्मान मिलेगा मगर प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर आपके चरण पूजक मित्र को मिलेगा जहाँ आपकी समस्त प्रतिभा तालियां बजाने और लोग जुटाने में खर्च होगी ऐसे में ‘मा विद्विषावहै’ पढ़ कर हमारी तरह कभी द्वेष नहीं करें (सलाह वैदिक है पर अंडरलाइन हमने किया है)। और अगर आप भयानक रूप से नैतिक और सच्चे हैं और प्रसंशा और चाटुकारिता के आसमानी अंतर को जानते हैं तो चाटुकारी लिजलिजेपन से दूर रहने का जो ये प्रयास आप करते हैं उसे अपने मन तक ही सीमित रखें क्या है कि ऐसे आप जगहँसाई से बचे रहेंगे क्योंकि भाई इन पवित्र ज्ञान के मंदिरों में रहते हुए अगर आप चापलूसी में माहिर नहीं हैं तो फिर आप के लिए यही उक्ति बचती है ‘सकल कला गुण विद्या हीना’ और हीनों पर हँसने का लाइसेंस तो नैतिक लोग भी देते हैं।खैर इसके आगे …अगर ये नैतिक वचन आपकी घुट्टी में गहरे हैं या प्रकारांतर से कहें तो अगर आप समस्त ज्ञानार्जन के पश्चात भी सत्यवादी बचे रहेते हैं तो निराश बिल्कुल न हों आगे भी आपको झोला भर सम्मान मिलेगा और ‘आपको’ प्रोत्साहित करने के लिए पदोंन्नति आपके चापलूस ‘पड़ोसी’ को दी जाएगी ,जो पदग्रहण के समय पूरी निष्ठा और खूब गंभीरमुद्रा में सत्यवादिता और निष्पक्षता की शपथ खायेगा। इसलिए या तो इस नैतिक बीमारी से छुटकारा पा लीजिए या तालियां बजाने के लिए हाथ और अशरीरी सम्मान बटोरने के लिए झोला अभी से मजबूत कर लीजिए।

भले ही आप कोई अंतर्यामी न हों पर मन की बात तो आप भी सुनते ही होंगे तो लगे हाथ हमारी भी सुन लीजिए।एक मुहावरा है कुँए में भांग पड़ना इस केस में तो हमें यही सही लगता है । जब पेड़ – पौधे ऐसे उग रहे हैं तो खराबी जरूर उस जमीन में ही होगी जाहिर है, जब प्रोफेशन में ये हालात हैं तो पढ़ाई भी ऐसी ही रही होगी।हमारे पुरखे तो कहते हैं कि बिना मांगे कभी राय नहीं देनी चाहिए पर हम क्या करें हमारे तो नाम में ही राय है🙄खैर अगर आप इस pj को नजरअंदाज कर चुके हों तो आपके लिए आसान ट्रिक है कि अगर आप अपने देश की किसी विख्यात विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग में पढ़ने की इच्छा रखते हैं तो पहले अपना राजनीति विज्ञान ठीक कर लें ,फिर कुछ चुनिंदा शब्दावलियां सीख लें जिसे गाहेबगाहे भांजते चलें और गैंग बनाना तो कत्तई आना ही चहिये इसके बिना आप काहे के इंटेलेक्चुअल ?अब भई इतना करने के बाद जो समय बच जाए उसमें ही पढें ! वरना अगर सिर्फ पढ़ना ही आपका शौक है तो टैग वाली यूनिवर्सिटी काहे जाना?

अब जो इतनी सुनी है कान में तेल डालकर तो इतनी और सुनते जाओ भइये! कि ये जो रामकहानी कही सो जलभुन के कही ,सही जिन जान लियो !पढ़ने वाले तो होते ही हैं हरजगह जो नहीं होते हैं वो एंट्रेंस टॉप कर के *व्यंग्य छानते हैं हमारी तरह!बाकी आप समर्थ जन हम अकिंचन!

(*भाँग)

जब कभी उड़ो तुम

धारा के विपरीत

दम जरा ज्यादा भरना

जब कभी ठान लो तुम

सच्ची बात कहना

जरा ज्यादा मजबूत कलेजा रखना

क्योंकि मेरे दोस्त

अपनी राह खुद गढ़ने वालों को

नहीं मिलते कहीं नींव के पत्थर

कहीं सफर में छांव

कहीं घड़ी भर दम

कहीं जी भर दुलार

उसके रास्ते का नहीं होता कोई कम्पास

ऐसे में अगर कभी भटक जाओ,

मेरे दोस्त,रास्ता मत पूछना !

क्योंकि जिनसे तुम्हारा सामना होगा

उनकी पैरहन फरिश्तों जैसी होगी

जिसमें छुपे होंगे उनके बाघनख

वो  नहीं लिए होंगे

भाले बरछी तीर

और वो तुम पर

सामने से हमला भी नहीं करेंगे

ये दौर थोड़ा नया है

वो तुम्हें मारेंगे नहीं,

पर जिंदा भी नहीं छोड़ेंगे।

औऱ अगर कहीं तुम फंस गए ,

उनके तिलस्मी जाल में

वो बिल्कुल भी नहीं करेंगे अट्टहास ।

इसलिए जब कभी

धारा के विपरीत निकलो

अपनी दृष्टि ख़ूब मांज लो

क्योंकि मेरे दोस्त इस सफर में

केवल वही है तुम्हारा हथियार।

(सुशांत सिंह राजपूत के दुःखद निधन पर)

मेरी पहली कहानी

लिखने का शौक मुझे बचपन से ही है पर रचनात्मक लेखन कभी प्रकाशित नहीं कराया ।ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ऑप्शन की उपलब्धता से सहूलियत भी है और रास्ते भी खुलते हैं ।इसी क्रम में मैंने यूँ ही एक कहानी लिखी जिसे स्टोरी मिरर पर डाला था और यहाँ की कुछ रचनाएं वहाँ भी डालने लगी ।दो बार ऑथर ऑफ द वीक के लिए संपादकीय टीम ने मुझे चुना पर वोटिंग और सेल्फ मार्केटिंग मुझे अच्छी नहीं लगती सो कभी शेयर नहीं किया और न कभी मुझे टाइटल मिला। मुझे रचनात्मक लेखन को अपने जानने वालों में शेयर करना पसंद नहीं वर्डप्रेस का माध्यम शायद इसे शेयर करने का बढ़िया जरिया है क्योंकि यहाँ मेरा नाम नहीं है। शायद मेरी रचना को पर्याप्त वोट न मिलें पर जब भी मैं यहां आउंगी मेरी पोस्ट में ये सूचना सुरक्षित मिलेगी।ख़ैर आप चाहें तो मुझे वहां वोट कर सकते हैं यहां मैं फ़ोटो डाल रही हूँ।लिंक मिलने पर शेयर करूँगी।

बनियापन

बचपन में हमारी दादी कहती थीं “बनिया कै जिउ धनिया” और हमारे सारे दोस्त बनिया,कई बार सोचा पूछूँ धनिया ही क्यों टमाटर- आलू जैसा कुछ क्यों नहीं ?कम से कम कह तो पाते , पर बचपन में सारी तार्किकता के ऊपर तमाचे का खौफ़ भारी होता है।

समय – समय की बात है शायद ! दादी की तो कट गई उनके जमाने में केवल बनिया ही बनिया था जिसका नाम,पता,जमीन सबकी उनको जानकारी थी। वरना आजकल तो जिसे देखो वही कुछ न कुछ बेच रहा है।बेचारे बनिया तो समान ही बेचते थे आजकल तो सबकुछ बिकता है ।जो अकलमंद है वो अक़ल बेच रहा है,जिसके अक़ल नहीं उसको भी चिंता नहीं शक्ल तो होगी ही उसे भी बेच सकते हैं और  भई जो आप इतने गरीब ठहरे कि कुछ भी नहीं तो भी निराश न हों किडनी ,हार्ट आंखें तो हैं उसके भी खरीददार हैं।

अगर आप पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं तो आपने कभी न कभी बाढ़ जरूर देखी होगी, हमने भी देखी है बचपन में ।जबतक पानी नदी – तालाब में रहता है अपन लोग नोटिस ही नहीं करते सीवर बना के रखते हैं।जब पानी पुल पर उफान मारने लगता है तो देखने वालों की भीड़ लगती है, पर वही जब सड़क पर पहुँच कर चुपके से आँगन में भरने लगता है तो कसम से कोरोना जैसी ही फीलिंग आती है।

बनियापन भी ऐसे ही फैल गया है ।बाजार में था तो सही लगता था ,फोन में आया तो सहूलियत बढ़ गई पर अब इंसानों के सॉफ्टवेयर को भी करप्ट कर रहा है तो सोचना लाज़मी है।

अब आप ये मत कहना कि हम अतिवादी हो रहे हैं और थोड़े अगर हों भी तो वो तो लिटरेचर का पुराना धंधा है।खैर मुद्दे की बात हमारे पास उदाहरण भी हैं

चलो मान लो कि आप किसी को इम्प्रेस करना चाहते हैं, तो क्या करेंगे?देवी अलेक्सा आंसर्स- गिफ्ट फलां गिफ़्ट ढिमका गिफ्ट ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ…इसके अलावा गिफ्टिंग – शिफ्टिंग, सेल्ब्रेटिंग ,डाइनिंग आउट ये सब क्या हैं ?क्यों हैं ? कभी सोचिए। कपड़े रखने की जगह नहीं है पर खरीदना है क्योंकि यू फ़ील गुड आफ्टर शॉपिंग!दैट हैप्पी हार्मोन थ्योरी !और फिर उसे पहनकर सोशल मीडिया पर ‘सेव एनवीरन्मेंट’ की पोस्ट भी तो डालनी है जबकि आपको पता है कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री सबसे बड़े वातावरण प्रदूषकों में से एक है।आप लाखों की डेकोरेशन करवा कर पार्टी देते हैं , आने वाले गिफ्ट खरीदते हैं और फ़ोटो खिंचवा कर मामला रफा – दफा, बैठ कर बात करने की तो सोचना गुनाह है।लोगबाग वापस अपने- अपने दड़बे  में । आयोजक और मेहमान थकान मिटाने के लिए छुट्टी ऊपर से लेते हैं,भई इस  सेलिब्रेशन में खुशी किसको हुई?इसमें फ़ायदा किसका हुआ?ये तो किसी ने सोचा ही नहीं।

हमारे तो आजतक समझ नहीं आया हमने बचपन से सुना था हमारी दादी कहती थी  जब भूख लगे तब खाओ, जब पहनना हो तब खरीदो ,जब एक जगह बहोत दिन हो जाये घूम आओ ।पर आजकल तो गणित ही गड़बड़ हो गया है, यहां जब बोर होते हैं तो  बाहर खाने जाते हैं, जब दुखी  होते हैं तो शॉपिंग करते हैं ,और जिन्होंने करोड़ों का घर बनवा रखा है वो अपनी बायो में नोमैड लिख रहे हैं।भई दया यहां तो कुछ ज्यादा ही गड़बड़ लगता है या तो अपन लोग की वायरिंग गड़बड़ है या अपन गलत गोले पर हैं।

या ये कोई कनेक्शन स्वैप का मामला है ।पर फिर तसल्ली होती है ये स्वैपिंग बड़े लोगों की बीमारी है अपन छोटे लोग ठैरे समझ कहा से आएगा।ऐसे भी हमारे घरवाले सोचते हैं हम सोचते बहुत हैं, इसलिए इस बारे में थोड़ा आप भी सोचें। अगर समझ आ जाये तो आप बड़े आदमी हैं अगर नहीं समझ आये तो अपनी कैटिगरी में! खैर आज केवल इतनी ही बकैती अभी के लिए अलविदा!शुभ रात्रि!

अतिवाद पर एक टिप्पणी

जो लोग अपने जीवन में संतुलन नहीं ढूंढ पाते हैं वे या तो आदर्शवादी बन जाते हैं या अत्याचारी।दोनों में कुछ खास फ़र्क नहीं है।एक खुद को दुख पहुंचाता रहता है तो दूसरा बाकियों को।दुख झेलना और दूसरे को दुख देना लगभग एक ही बात है दोनों के लिए इससे उन्हें संतुष्टि मिलती है।