LIEBSTER AWARDS

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First of all, thank you Nimish for nominating me ! And sorry Kamran sir and nimish iske phle bhi jab nominate kiya aap sab ne main reply post nahin kar payi. Now coming to the questions-

1.How do you judge a person ?

I basically don’t judge people but still if I would ever judge anyone it would be on how the person expresses his/her views.

2. If you have to choose between Ronaldo and messi ,who will you choose and why ?

I usually don’t watch matches as such and specially football so I’m not gonna answer this.(though I guess I would prefer Ronaldo, he’s damn handsome!).

3.Best childhood memory

I have so many stories if I have to pick one of them it would probably be the one , where we(me and my sister)used to dance in front of the mirror and one day our tutor caught us dancing. Lol 🤣🤣

4.Your favorite emoji?

Offcours it’s 😊😊

5.Do you support the annihilation of caste?

Yeah , for sure, as it almost pushed back hindu community, as We all are living in a modern (post modern ) society we must do some efforts regarding the issue.(Cast System- as it was described in later vaidic period and was functional till middle ages )

6. What’s the best practical joke that you’ve played on someone or that was played on you ?

Well I can neither imagine myself being  prey of a joke and nor can I play it on anyone! I’m way more serious than it looks!

7.Love Marriage or Arrange marriage?

Hmm! I guess the second one, for people as shy and reserved as me don’t even get friends easily and  it’s quite difficult for me  to even start a conversation I can never imagine my self in any such relationship.

8.Which is your favorite marvel character?

I think I have borrowed some of the comics from bhaiya but I never really liked them as I don’t even remember any character! Sorry 😊

9.who was your craziest teacher?

It was Raman sir , while I was in M A he used to give us term papers like in which type of stage do you like to play that certain play? And we were like 🤔🙄 really ?we are supposed to write this ? We don’t even know the names of famous directors how could we write that whole paper.

10.what according to you is the best way to tackle climate change?

I think we are not responsible in our lives .We might solve this problem if we take small steps at individual level like planting trees and avoiding plastic use can be the best way to tackle this.

11.What will you do if you were the only person left on earth ?

Hahaha😊☺️I would definitely search for a chimpanzee as we almost(94%) have same D N A !

Hey I  almost forgot to nominate! and I’m unable to get your e-mail address.

So here are  My nominees-

1. Kumar Param

2. Rekha Sahay

3.sngms

4.Arun Arpan

5.Rahat jahan

6.Madhusudan Sir

7.Kamran sir

8. Ek shabd premi

9.prakashpensia

10.T S abhi

10 Questions I would like to ask you guys-

1.If you ever get a chance to help poor people how would you do this ?

2.What was the worst punishment you got in school ?

3.what according to you is women empowerment ?

4.Which one do you love to read a prose story or poetry and why?

5.what’s your dream job ?

6.when and how did  you start writing ?

7.what is the best advise you’ve ever received?

8.How you look at life ?

9.Who is your favourite writer ?

10.give us the names of last 10 books you’ve read ?

 

Thanks again Nimish !

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प्यारी गिल्लू

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हमारी शाम की चाय की साथी,बड़े हक़ से अपना हिस्सा मांगती हैं और जो न मिले पैर से सिर तक दौड़ लगाने को तैयार रहती हैं।हमारी दोस्ती को शायद एक महीना ही हुआ है पर इनकी बेतकल्लुफी क़ाबिले गौर है।काश ये भी लिखती तो जान पाती कि जब नहीं जाना हो पाता लाइब्रेरी वाक़ई इन्हें याद किया जाता है।

मिस यू प्यारी गिल्लू

रेत के घर

बिटिया कहाँ समझती है बड़ों की बातें

कहीं भी तान लेती है सपनों की कनातें

लोगों की गहमागहमी में

रेत की नरमी में

समंदर की बाहें मरोड़कर

बनाती है मजबूत हवाई किले

और अपनी चटक नन्ही बाहों में

महफूज़ समझती है उन्हें

अपने ही मीठे गीत की धुन में मगन

कहाँ सुनती है वो

चुपचाप आती लहरों की आवाज़

अपने मजबूत स्नेहिल जोड़ पर मुतमईन।

लोग कहते हैं सांझ की लहरें

समेट लेती हैं वो सबकुछ

जिसे वो अपना समझती हैं

पर बिटिया कहाँ समझती है बड़ों की बातें।

 

 

 

 

 

 

झुँझलाये हुए शुक्ल जी

“भावुकता  भी जीवन का एक अंग है। साहित्य की किसी शाखा से हम उसे बिल्कुल हटा तो सकते नहीं । हाँ यदि वह व्याधि के रूप में – फीलपाँव की तरह – बढ़ने लगे , तो उसकी रोकथाम आवश्यक है।”पेज 446,

“कविता भावमयी, रसमयी और चित्रमयी होती है ,इससे यह आवश्यक नहीं कि उसके स्वरूप का निरूपण भी भावमय , रसमय, चित्रमय हो।” पेज 450

“योरपवालों को हमारी आध्यात्मिकता बहुत पसंद  आती है ।भारतीयों की आध्यात्मिकता और रहस्यवादिता की चर्चा पच्छिम में बहुत हुआ करती है।इस चर्चा के मूल में कई बातें हैं ।एक तो ये शब्द हमारी अकर्मण्यता और बुद्धिशैथिल्य पर पर्दा डालते हैं ।”पेज 453

“वे कला संबंधी विलायती पुस्तकों की बातें लेकर और कहीं materlink, कहीं गेटे(Goethe) कहीं टॉलस्टॉय के उद्धरण देकर अपने लेखों की तड़क भड़क भर बढ़ाते हैं।लेखों को यहां से वहाँ तक पढ़ जाइये , लेखकों के अपने किसी विचार का पता न लगेगा।”

पेज 454

” हमारे यहां काव्य की गिनती 64 कलाओं के भीतर नहीं की गयी है।…योरोप में चित्रकारी , मूर्तिकारी ,नक्काशी, बेलबूटे आदि के समान कविता भी ‘ललित कलाओं ‘ के भीतर दाख़िल हुई ; अतः धीरे धीरे उसका लक्ष्य भी सौंदर्यविधान  ही ठहराया गया।राका रजनी की शुष्मा का अनुभव सुंदरी के उज्ज्वल वस्त्र या शुभ्र हास द्वारा किया जाय, आकाश में फैली हुई कादम्बिनी तब तक सुंदर न लगे जबतक उसपर स्त्री के मुक्त कुंतल का आरोप न हो।आजकल तो स्त्री कवियों की कमी नहीं है ,उन्हें अब पुरुष कवियों का दीन अनुकरण न कर अपनी रचनाओं में क्षितिज पर उठती हुई मेघमाला को दाढ़ी मूँछ के रूप में देखना चाहिए।

पेज 459

“आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास , वाणी प्रकाशन, संस्करण-2011(मूल -1929 , पुस्तकाकार 1939)

चलती चाकी देख कर ,दिया कबीरा रोय

आप किसी से पूछें कि ज़िंदगी क्या है ?तो वो ये कह सकता है कि वही जो मौत नहीं है ,या जो मौत आने तक रहती है या वो जो अपनी पूर्णता में मृत्यु बन जाती है।ये सब महज़ कहने के तरीक़े हैं , सच एक ही है कि दोनों में कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं है।

हमारे शब्द भी बहुत बार बेमानी, ऊलजलूल विचारों की श्रृंखला हो जाते हैं , जब उनसे हमारी रूह न जुड़ी हो।इनसे लाख गुना अच्छे तो मकड़ी के जाले हैं कम से कम वो उसकी भूख मिटाने के काम तो आते हैं ,पर बेमानी शब्द , लच्छेदार अलंकार और  रंगीन भाषा , बेढंगे पैबंद की तरह समय के साथ धब्बों की शक्ल में बाक़ी रह जाते है , एहसासों से खाली ,दीमक की बाम्बी की तरह।

उसूल की तरह भागमभाग जैसे एक एवरेज इंसान बनने की रस्म ही चल पड़ी हो।दुनिया जैसे एक ज़ेरॉक्स मशीन हो जिसमें फोटोकॉपी ही फोटोकॉपी निकल रही हो। खैर हम कबीर तो बन नहीं सकते पर अपने समय को देखते हुए वो याद बार -बार आते हैं।

“चलती चाकी देख कर दिया कबीरा रोय,

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।”

और दिन-रात मज़ाल है कि रुकें, अपनी धुन में चले जा रहे हैं ।लगता है घड़ी की सुईयों के बीच हाथ रख दें, पर फिर कमबख्त दिमाग? वो बता देता है ,भई समय ऐसे नहीं रुकने वाला।

इतनी मग़ज़मारी के बाद समझ आता है कि सारी फसाद की जड़ ये चलता हुआ समय है ,जिसमें नापी जाती है सांसों की खुराक!फिर उपाय क्या ?कहते हैं कोई ऐसा तरीका भी है जहां समय के बीच आना जाना हो सके। पर ये या तो योगियों से सुना या तो टेस्ला जैसे वैज्ञानिकों से। पर भई ! जो एवरेज इंसान है उसकेे लिए? उसके लिए नहीं है जी, ये सब ! तो फिर उसके लिये ? तो उसके लिये है -टिक टिक वाली घड़ी,माचिस की डिब्बियों जैसे एयर कंडीशंड डब्बे और ट्रेंडिंग फैशन , चलताऊ अपराध , राजनीतिक घटनाक्रम ,लज़ीज़ व्यंजन और बस्स! ज़िन्दगी यही है , और हम दिल को फिर फुसला लेते हैं ।

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।

 

पता नहीं किताबों में कौन सी ख़ुशबू होती है जो खींच लेती है और बहुत बार तो ऐसी किताबें जिनका आपके काम से दूर – दूर तक कोई ताल्लुक न हो। आसान शब्दों में इसे ही शायद किसी महापुरुष ने procrastination कहा है 😊🤔 बहरहाल अपने काम की एक बुक पढ़ने के बजाय बेवज़ह हमने दो बुक्स खत्म कीं पर मजाल की दिमाग से अपने लिए थोड़ी भी तसल्ली पाई हो भई मसला भी संगीन था आजका पूरा दिन चिन्हार ( मैत्रेयी पुष्पा) और तिरिया चरित्तर(शिवमूर्ति) की लंबी कहानी पढ़ने में निकल गया।

खैर में उन लोगों में नहीं हूं जो बदला लेते हैं सो आपका वक़्त जाया किये बगैर दोनों का सारांश दे रही हूँ, इस आशा से की हमारी भलमनसाहत किसी के तो काम आए।

पहले मैत्रेयी पुष्पा , जानीमानी स्त्रीवादी लेखिका इनके उपन्यास खासकर ‘चाक’ बहुत चर्चित रहा। राजेन्द्र यादव जी जो कि हंस के संपादक थे 2012 में उनका देहावसान हुआ, इनके प्रसंशक थे और फिर जो हिंदी आलोचना में जगह बना ले भई वो चर्चित हो ही जाता है। खैर मैत्रेयी जी अभी भी सृजनरत हैं और कभी कभार सेमिनारों में दिख जाती हैं ।व्यक्तिगत तौर पर मुझे वो कृष्णा सोबती से  कम अच्छी लगती हैं ।खैर ये कहानी संग्रह है उनका इसकी सारी कहानियां देना मुश्किल है सबसे चर्चित कहानी ‘गोमा हंसती है’ पर ही बात करते हैं ये गोमा पर केंद्रित है जो जाट परिवार की बहू है और सुंदर भी।बाकायदा पैसे दे कर ब्याही गयी इस बहू का पति ज्यादातर कहानियों की तरह बदसूरत है। खैर मुद्दा ये है कि वो आते ही घर को सँवारने लगती है और बलीसिंह जिसका विवाह नहीं हो पाता और बड़ी जायदाद का मालिक है उसे भी घर में रहने के लिए अपने पति को मना लेती है। घर तेजी से समृद्धि की ओर बढ़ता है पर गाँव वाले? भई वो कहेंगे ही और उसका पति भी पुरुष होने का फर्ज तो निभाएगा ही अपने बेटे को अपना नहीं मानता पर गोमा जैसा कि वो खुद कहता है जादू करती है और उसे मना लेती है । खैर कहानी वहाँ खत्म होती है जहाँ गोमा के मायकेवाले बलीसिंह को बुरी तरह घायल करके छोड़ते हैं और गोमा का पति उसे घर ले आता है। कहानी पर कोई आलोचना मेरी नज़र में नहीं आयी है।पर मुझे लगता है लेखिका सामाजिक पहलू को दिखाना चाहती है जहाँ गांव वालों की तरह उसके मायकेवाले भी उसे गलत समझते हैं।पर वह गांव वालों से तो लड़ सकती है अपने परिवार वालों से नहीं।साथ ही इसका दूसरा पहलू एक सशक्त स्त्री की छवि से भी जुड़ा हुआ है जो अपने पति से कहीं ज्यादा समझदार है और इसलिए लोग उसे उसका जादू कहते हैं।खैर लेखिका की चाक उपन्यास की स्त्री पात्र सारंग भी ऐसी ही तेजतर्रार स्त्री है ।खैर इसकी सार्थकता के और पहलू भी हो सकते यहां के लिए इतना काफी है शायद।संग्रह में कई और अच्छी कहानियां भी हैं।उनपर भी कभी लिखती हूँ।

अगली कहानी शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर है ठेठ गावँ की ठेठ और काफी कुछ न्यूज़पेपर की घटनाओं की तरह कहानी चलती है ।इसपर विश्वास करने के लिए यकीन मानिए आपको शिल्प की जरूरत नहीं पड़ेगी।शिव मूर्ति जी को एक सेमिनार में सुना भी था जैसे सीधी वो बातें करते हैं काफी कुछ वो लिखते भी वैसे ही हैं पर उतना ही रोचक भी।

कहानी एक गरीब लड़की की है जो अपने माँ बाप के लिए ईट भट्टे पर काम करती है और उनकी जरूरतें पूरी करती है जिससे कि उन्हें यह महसूस न हो कि उनका बेटा उन्हें छोड़ कर अलग हो गया है। अपने पैसों से वह बकरियां और गहने खरीदती है और तमाम प्रलोभनों को ठुकरा कर अपने पति और ससुराल के सपने देखती है।जिसकी उसे शक्ल भी याद नहीं । अंत में उसके पति के आये बगैर उसका गौना होता है और उसका ससुर जो कि मायके वालों से धनी है उसे दबाव डालकर संबंध बनाना चाहता है। नई बहू होने की वजह से उसके लिए गांव में  किसी से भी मिल पाना मुश्किल है अंत में उसकी परिणति अनिवार्य रूप से उसके ससुर के पक्ष में होती है।अंत में वो अपने पति के पास भाग जाना चाहती है और गांव वाले उसे ढूढ़ लेते हैं उसके सच की बजाय उसके काल्पनिक आशिक़ की कहानी वैसे भी ज्यादा रुचिकर होती…और अंत में पंचायत उसके तिरियाचारित्तर के लिए उसे माथे के बीच दाग दिए जाने का दंड देती है और समाज सतयुग में पहुँच जाता है उसकी बला से। खैर कहानी पढ़ कर वितृष्णा से ज्यादा घिन आती है पर अफ़सोस पाठक कहानियों के शब्द नहीं बदल सकते और न कहानियां सच को।

 

“दुख की पिछली रजनी बीच

विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील

छिपाए है जिसमें सुख गात।

जिसे तुम समझे हो अभिशाप,

जगत की ज्वालाओं का मूल;

ईश का वह रहस्य वरदान

कभी मत उसको जाओ भूल।”

कामायनी (श्रद्धा सर्ग, पेज 54, जयशंकर प्रसाद)

मेरे सबसे पसंदीदा कवि की पसंदीदा सुंदर पंक्तियां आप सब के लिए । इनकी श्रद्धा बचपन से ही आकर्षित करती रही जब शायद इतनी भी समझ नहीं थी कि ये इतने बड़े कवि हैं और श्रद्धा मिथकीय कामपुत्री(कामायनी)।बहोत से बिम्ब उभरते हैं जब इनकी कामायनी को पढ़ते हैं ऐसा लगता है कि ये चलते फिरते दृश्य हमारे आस पास ही गुजर रहे हों।प्रलय के बीच मनु की नौका आखिर किसी किनारे पर टिकती है , विचारों और स्मृतियों में घिरे मनु जीवन की एकांत साधना में लीन और किंचित उदासीन हैं और इसी बीच श्रद्धा का आना, वाक़ई कितने सारे सुंदर भाव और उनकी उतने ही सुंदर अभिव्यक्ति!

अगर मौका मिले तो आप सब भी पढ़े , इसका कॉपीराइट ख़त्म हो चुका है , ऑनलाइन फ्री अवेलेबल है डाउनलोड कर सकते हैं। हिंदी खड़ी बोली की क्लासिक कृतियों में से एक है और सुंदर शब्दों का पिटारा भी !न सही आनंद पर कुछ शब्द जरूर बढ़ जाएंगे आपकी हिंदी वोकैब के। अलविदा आज के लिए और दुआ कि हम सब कुछ और पढ़ें और कुछ और जानने की हमारी जिज्ञासा निरंतर बनी रहे आमीन!

हथेली और चांद

चाँद कुछ बहुत दूर नहीं था,

मेरी हथेली से, पर

चक्रव्यूह के द्वारों में घिरे अभिमन्यु की तरह

अकेला मन,आहत हुआ बार-बार,

धोखे ,छल और कुघातों की मिसालें

कायम हुईं बार – बार

हर फैलाव पर ,कुंठाओं के आघात

और दमघोंटू सड़ाँध-

अभिशप्त अश्वत्थामाओं की,

घोंट देती थी दम

और बिसूरती हुई हथेलियाँ

सिकुड़े हुए तालाब की तरह

हर कंकड़ की आहट पर

कुछ और सिकुड़ जाती थीं।

क्योंकि फेंके गए पत्थर-

डूब नहीं जाते थे ,बल्कि

वलयों में दूर तक

सिहरा जाते थे।

और खुले हुए हाथ

बेतरतीब धड़कनों की

ग़फ़लती होड़ में

कांप उठते थे बहुत बार

पर बार -बार का ये फैलाव और खिंचाव

कभी ख़त्म तो होना ही था

इसलिए ही कहना है चाँद से

मेरी मुट्ठी में और तुममें

अब कुछ बहुत दूरी नहीं है !

उतना वह सूरज है

चित्र- मेरा

कविता- भारत भूषण अग्रवाल

धीरे धीरे ,

लो फैल चली आलोक रेखा

घुल गया तिमिर , बह गई निशा ;

चहुँ ओर देख ,

घुल रही विभा , विमलाभ कांति ।

अब दिशा- दिशा

सस्मित ,

विस्मित ,

खुल गए द्वार, हँस रही उषा।-भारत भूषण अग्रवाल (फूटा प्रभात)

मौन भी अभिव्यंजना है – अज्ञेय

आपने सोचा है कभी कि तर्क क्या है ?जब कभी हम बहुत सोच विचार कर कोई तथ्य रखतें हैं तो कहते हैं यही तार्किक है और प्रकारांतर से यही कहना चाहते हैं कि यही सच है।

आधुनिकता ने हमें सबसे मजबूत हथियार दिया था तर्क का । आज भी इसे इतना महत्व मिलता है इसका कारण शायद ये है कि ये हमारे लिए सबसे अधिक सुविधाजनक है । वरना तो क्या? इसके भीतर कुछ सार नहीं है ।कबीर के शब्दों में भौतिक संसार की तरह थोथा, सेमल के फूल की तरह गंधहीन।

तर्क सचमुच कुछ नहीं है केवल देने वाले के द्वारा अपने पक्ष में खोजी गयी तमाम dimesions हैं और चूंकि वो और लोगों की सोच और प्रश्नों को अपने जवाबों से निरुत्तर कर देता है ,इसीलिए उसे स्वीकार कर लिया जाता है एक सिद्धान्त की तरह । पर मुझे तो शक होता है इस प्रक्रिया पर !क्या है कि कम से कम सच वो है जो कभी न बदले, फिर सिद्धान्त ऐसे उलटते पलटते क्यों हैं भई? शक तो होगा ही तर्क पर भी और भाषा की सीमा पर भी। बस इसी लिहाज़ से अपनी तर्कों से कुट्टी है केवल तर्क ही क्यूँ अतर्क, कुतर्क, सतर्क सबसे! और बहुत हद तक समझ भी आ रहा है कि महज़ तार्किक होने से सब सच नहीं हो जाता पर मजबूरी ये है कि हम तर्कों की भाषा में बात करने को बाध्य हैं।अज्ञेय ठीक ही कहते हैं-

‘मौन भी अभिव्यंजना है,

जितना तुम्हारा सच है ,

उतना ही कहो!’