ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासे:,कोई चारसाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता।

जी ग़ालिब हैं कि यहां भी हाज़िर हैं।आजकल की दोस्ती , इंसान बाज़ आये ऐसी दोस्ती से ।चलिए आप से ही पूछती हूँ जो कोई ग़मगीन हो तो क्या करना चाहिए? उसकी गलतियां गिनानी चाहिए , यूँ न करते तो ये ना होता,तुम्हारी आदतों का सब अंजाम है,और न जाने क्या क्या…आप दोस्त न हुए काउंसलर हो गए ,कोई जो गरचे देखे तो यूँ आपको वक़ील भी समझ बैठे ,पर दोस्त ??ना वो तो ऐसे नहीं हो सकते।

दोस्ती की इस पोस्टमॉडर्न सोच से ज़रा बाहर निकलें और ग़ौर करें।एक ग़मगीन शख्स क्या चाहता है अपने दोस्त से ?

ग़लतियाँ करने वाला शख्स गर गमख़्वार है तो बहुत मुमकिन है उसे उसकी ग़लतियाँ खुद ही पता हैं,अपनी कमियां अपनी कमजोरियां बाकायदा।

ग़रचे दोस्त कुछ और ही चीज़ होते हैं ,शायद वो क़ीमती शख्स ,वो लख्ते ज़िगर, जो आपकी टूटती – लरज़ती रूह को घनी छाँव की मानिंद सींच दे,जिनकी खुलूस की गर्माहट सिकुड़ती हुई रगों को फैला दे।जो टूटकर भी जड़ों में लगी मिट्टी की तरह चिपका रहे।दोस्त शायद उसे ही कहते हैं।

माना कि यूँ दोस्त मिलना ज़रा मुश्किल है पर नामुमकिन तो नहीं।और जो न ढूंढ पाएं ऐसा तो खुद ही ऐसा बनाने की कोशिश क्यूँ न करें।जी ऊपरवाले ने गर रूह दी है तो थोड़ा रूहानी बन जाने में कुछ बुराई तो नहीं।इसी दुआ के साथ कि ये दुनिया ऐसे लोगों से भर जाए । आमीन!!

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अहरनि रहे ठमूकडा,जब उठि चला लुहार

नायाब चीजें शायद अकेली ही होती हैं।यूँ तो हर हीरे को जौहरी की दरकार होती है, पर कभी कभी जीते जागते इंसान भी एक ऐसे ही जौहरी की दरकार में अपनी तमाम नेमतों को छुपाये बस पल -पल गर्क होते रहते हैं। हम इस दुनिया में जैसे आते हैं, वैसे ही चले जातें हैं, कहानी के एक आम प्यादे की तरह!बस बीच की ये खाली जगह हम भरते हैं। रंगीन धागों की तरह खिंचते ,बढ़ते ,चढ़ते और रंगते-

झीनी झीनी बीनी चदरिया

पर इसी उधेड़ने बुनने में कब जिदगी की उसी रंगीन चादर के नीचे पहुचने का वक़्त आ जाता है पता भी नहीं चलता।

आपको क्या लगता है ?क्या सचमुच इतना मुश्किल होता है खुद को पहचान पाना?अपनी अहमियत , अपनी कद्र और अपनी खासियत इसके पहले की ज़िन्दगी का सूरज अपनी शाम को पहुँच जाए फिर तो चाहे कितनी भी ख्वाहिश हो, क्या फायदा? सँवारने वाला लुहार ही जब चलने को उठ पड़ा हो, कबीर भी तो कहते हैं-

‘अहरनि रहे ठमुकडा जब उठि चला लुहार’

इसलिए जिस पल ऐसा लगे कि कुछ है खुद के भीतर कुछ ऐसा है जो सुंदर है , प्यारा है ,और आपकी अपनी आवाज़ है तो फिर ये जो आप बार – बार ख़ुद पर शक़ करते हैं ना ?उसे झटक कर बैठ जाइए उसे बुनने पिरोने और कुछ खास बनाने में।ज़िन्दगी ऊपर वाले का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है और आप खुद उसकी सबसे सुंदर कृति । दीपों की जलती हुई अवली जैसे अमावस के अंधेरे और हवाओं के बीच भी अपनी गुंदुमि , दूधिया और लपलपाती रौशनी से ही सही लोहा लेती हुई जलती रहती है वैसे ही आप भी अपने भीतर की रौशनी को यूँ ही जलाये रखें, अविरत और कर्मप्रसु बन कर ,इसी आशा के साथ-‘दीपावली की ढेर सुभकामनाएँ ‘आप सभी को!

या रब जमाना मुझ को मिटाता है किसलिए, लौह ए जहाँ पे हर्फ़ ए मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

कितनी टूटन है इन लाइनों में और दर्द ऐसा जैसे किसी तरोताजा,धड़कते हुए दिल को कोई तेज़ चीज़ चीर जाए। आख़िर ग़ालिब बनना इतना आसान भी तो नहीं।

ज़माने से इतनी शिकायत ! आख़िर क्योंकर जबकि हम खुद उसके ही टुकड़े हैं।पर जी!जो नम आंखे और जज़्बाती दिल रखते हैं, उनकी रूहें देखकर ख़ुदा भी एकबार गमख़्वार हो जाए । इतना आसान कहाँ होता है ऐसे जीना।एक शीशे का दिल , ख़्वाब भरी आंखें और नर्म जज़्बात वाली रूह आखिर चटकती,सूखती,झुलसती नहीं तो यूँ बोल भी तो नहीं पाती।इस बेजान, खुरदुरी, सख्त और बेरंग दुनिया का दिल होते हैं ऐसे लोग।तो जी बस्स! दिल को यूँ ही संभालिये। किन्ही आंखों की तरावट पढ़ डालने,और चेहरे की शिकन से रूह की तासीर जानने की अदा कोई पत्थरदिल क्या जाने और ख़ुदा की इस नेअमत को खुले दिल से अपना लीजिये जिंदगी आसान न सही खूबसूरत तो हो ही जाएगी इस दुआ के साथ। आमीन!

उम्र -ए -दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन ,दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में

इंसान पूरी ज़िंदगी जिस एक चीज़ की ख़्वाहिश में काटता है वो शायद ‘एक मुक़म्मल भरोसा’ होता है एक ठहराव एक स्थाईपन पर दुनिया में शायद यही सबसे मुश्किल चीज़ है। क्योंकि ये शुरू ही वहां से होती है जहाँ ठहराव खत्म हो, रुकना ही यहाँ मौत है।सबकुछ बदल सकता है लोग, रिश्ते,नाम, शोहरत,पैसा कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप यकीनन अपना कह सकें।कुछ भी हो सकता है बस एक पलक के झपकने में।

आप कहेंगे बस्स!इतनी सी बात।ये तो सबको पता है।तो जी आप मुग़ालते में हैं।क्योंकि कहना एक बात है और उसे महसूस करना दूसरी।बहोत बार कहने और कर पाने की दूरी पूरी एक उम्र का फासला बन जाती है और जब चीजें सच मे हाथ से फ़िसल जाती हैं तो चाहे अनचाहे ये कड़वा सच जहन में बैठ पाता है।

खैर ये तो बड़ी बड़ी बातें हो गयी जी!बस्स कभी कभी छू जाती हैं कुछ लाइनें बेसाख़्ता और बेतावज्जो भी दिमाग में अपना घर बना लेती हैं ये लाइनें भी कुछ ऐसी ही हैं-

उम्र ए दराज़ मांग के लाये थे चार दिन

दो आरजू में कट गए तो इंतजार में।

बोझ तो ख्वाहिशों का है…

‘कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता

किसी को जमीं तो किसी को आसमाँ नहीं मिलता।’

जिंदगी का फ़लसफ़ा भी कुछ ऐसा ही है। देने वाले ने कुछ ऐसी कारीगरी से दिया है कि बटोरने को सब कुछ है पर हमारी मुट्ठियों में कुछ ही समा पाता है।जैसे ही कुछ और ढूंढते हैं कुछ न कुछ फिसल पड़ता है उसमें से। सबकुछ को साधना जैसे फिसलती हुई रेत को मुट्ठियों में भींचना है जितना ही जोर से पकड़ते हैं उतना कम बच जाता है।

आसिफ़ा

कम्बख्त ये इंसान बड़ा चालबाज होता है और उनमे भी मर्द हो तो माशा अल्लाह!! आदमी की कुछ कैफियत ही ऐसी है, पहले मंदिर बनाता है और फिर प्रसाद चढ़वता है और उस प्रसाद को पूरी श्रद्धा से खुद गटक जाता है. अगर कभी ऐसा हो कि भगवान ख़ुद प्रसाद खाने लग जाएं, तो जनाब सच में खून खराबा हो जाएगा यकीन मानिए.

जी आप ये ना सोचें मैं क्या बातें कर रही हूं? जरा गौर फरमाईये मैं फितरत की बात कर रही हूं. ये जो आसिफ़ा नाम की बला है ना! उसकी… उसकी जिंदगी की बात! आप ये पूछेंगे उसका इससे क्या राब्ता? है ना राब्ता… ओलिंप द गूज का नाम सुना है? खैर अगर आप मर्द हैं तो क्यूँकर सुना होगा? फ्रांसीसी क्रान्ति तो सुनी होगी! जी वही क्रांति! बास्तील का किला ढहाने वालों में औरतें भी थीं. जो चाहती थीं वही समानता और स्वतंत्रता जो मर्द चाहते थे और ओलिंप उसने तो लोहा लेने की ठान ली थी जब क्रांति के बाद उसे सिर्फ हंसते – चहकते मर्द दिखे जिनके लिए औरतें घर को सजाने की चीजें थी और लड़ाई का जंग खाया हथियार भर! और उसे इसका बराबर मुआवजा मिला मृत्युदण्ड के रूप में. और उसकी क्रांति भी उसके साथ ही दफन हो गई.

आसिफ़ा के नाम पर लड़ने वाले तमाम फेसबुकियों को देखकर बेसाख्ता वो याद आती है… बार बार… उन औरतों में जो इस राजनीति से बिल्कुल बेखबर हैं…आज BJP का विरोध करने के लिए आसिफ़ा हथियार है कल हिन्दुओं का खून खौलआने के लिए कोई सीता या गीता होगी. क्या फर्क पड़ता है? औरतें पहले भी हथियार थी आज भी हैं. जाने क्यूँ दूसरों को वजूद में लाने वाली औरतें ख़ुद का वजूद नहीं ढूंढ पातीं. आज तो जैसे सारे शब्द खो से गए हैं… कोई lines नहीं… बस एक दुआ है ईश्वर उन्हे शांति दे अगर उसके पास बच गयी हो!!

ख्वाहिशें

कभी-कभी हम किसी ऐसी चीज का पीछा करने लगते हैं जो कभी हमारी हो ही नहीं सकती ।बेशुमार शिद्दतों और खुद को मिटा देने वाली हिम्मत के साथ शामिल होने पर भी वो हमसे छीन ली जाती है । बड़ी ही बेदर्दी से । आधी पढ़ी हुई किसी story book की तरह जिसे पूरा जान सकना कभी मुमकिन ही नहीं होता । पर यकीन करिये ऐसी books की जगह शायद सिर्फ बंद आलमारियों में ही होती है।जहाँ वक़्त की गर्द ही इनकी सही परवरिश कर सकती है । क्योंकि उनका शायद छूट जाना ही अच्छा होता है। बेशक दर्द तो बहुत होगा पर बेवक़्त का राग आखिर कब तक गाया जा सकता है । कुछ दर्द लाइलाज़ होते हैं। पर उन्हें भूलने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ना चाहिए । अल्लामा इक़बाल की ये लाईने बेसाख्ता याद आ रही हैं-

तू शाहीन है परवाज है काम तेरा

तेरे सामने आसमान और भी हैं।

यूँ भी लग सकता है की आखिर उम्मीद क्यों छोड़ें आपनी ख्वाहिशों को पाने की ? तो जी दुनिया में ऐसे बहोत से क्यों हैं जिनका कोई जवाब नहीं है। बहते हुए पानी पर चाहे कितना ही पत्थर घिसे उससे आग नहीं निकल सकती ।और वैसे भी कहते हैं उपरवाले की बनाई इस दुनिया में कभी कोई निराश नहीं होता । हो सकता है उसके खजाने में कुछ उससे भी कीमती आपका इंतजार कर रहा हो। आमीन !!

मुखौटे और जिंदगी

कहते हैं दुनिया में जीने के दो ही तरीके होते हैं या तो खुद को एक खुली किताब की तरह बना लो या फिर एक दूसरी ही दुनिया में खुद को कैद कर बाहरी दुनिया से मुसलसल जंग करते हुए जिओ। पर क्या ही खूब होता अगर इसे चुन पाना इंसान के खुद के हाथ में होता ।

कहते हैं हमारी जो रूह होती है सदियों पुरानी होती है और चाहे जितनी पैरहन बदले उसकी अपनी पहचान नहीं बदलती ।

पर! ये नामुराद लोग , हमेशा आपको बदलना चाहते हैं । लोग प्यार करते हैं आपको उन्हीं वजहों से जो आप हो ! पर जिंदगी में आते ही सबसे पहले उन्हीं चीजों को बदलना चाहते हैं । कोई समझाए भला ! की कैसे बदलें सदियों पुरानी रूह की तासीर ! और ऐसे प्यार करने वाले लोगों का क्या करें? शायद एक रास्ता मुखौटे हो सकते हैं ,पर फिर अगर ऐसे बेजान बुतों की बातों में कोई मतलब ढूंढे तो बेसाख्ता एक आह उठती है –

अस्ल हालत का बयां जाहिर के सांचों में नहीं।

बात जो दिल में है मेरे लफ्जों में नहीं।- अफताब हुसैन

ख़ुशदिल बेवकूफ़

आपने कभी ग़ौर किया है? ये जो समझदारी है न किसी चरस की लत की तरह है जो एक बार पड़ गयी तो ताजिंदगी नहीं छूटती।आप लिपटते चले जाते हो और खो जाते हो ।बाहर से चाहे जितनी आवाजें हों अन्दर कुछ पहुँचता ही नहीं । एक झीनी छन्नी की तरह जिसमें से सब कुछ निचुड़ पड़ता है प्यार ,गुस्सा ,दुःख ठहरता कुछ भी नहीं।

यूँ तो करीने से संवारा गया नाख़ून भी अगर टूट जाये तो दिल तड़प उठता है लेकिन जो चीज भीतर तक सालती है वो शायद किसी की मासूमियत का खो जाना है । बेउम्र -बेवक़्त जैसे किसी फूल का मुरझा जाना है । ऐसा मानो किसी नम गुलाब पर किसी तेज कुल्हाड़ी का चल जाना ।पर इंसान के हालात कभी कभी जिंदगी की कीमत में उसकी मासूमियत उसकी शोखियों को छीन लेते हैं ।फिर क्या करें !जी सवाल तो बहुत हैं पर जवाब नदारद। न तो वक़्त की घिरनी को पीछे घुमाया जा सकता है न बिना कराहे दम साधे जिया जा सकता है । खैर ऐसे में यूँ ही क्यों न मान ले कि चलो न सही अपनी किस्मत में एक खुशदिल बेवकूफ़ होना,पर ऐसा मान लेने का हक़ तो कोई हमसे नहीं छीन सकता । फ़िलहाल –

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।

बेजुबां शिकायतें

हवा चराग़ बुझाने लगी तो हमने भी

दिए की लौ की जगह तेरा इंतज़ार रखा ।- मोहसिन असरार

कितना मुश्किल होता है कुछ यादों को भूल पाना। खासकर जब आप सच में ही उन्हें भूल जाना चाहें और वो किसी साख की छाल की तरह चिपक पड़े ,और उनका टुकड़ा टुकड़ा आपको लहूलुहान कर जाए । कुछ चीजें शायद इंसान के अख्तियार से बाहर होती हैं और वो सरहदें नहीं जानती बेसाख्ता सबको लपेट लेती हैं विलियम गॉल्डिंग्स फरमाते हैं_

‘a person can do what he wills,but he can not will what he wills’

पर ऐसा करने की कोशिश करना और फिर न भूल पाना एक कैद में जीने की तरह होता है जहाँ कोई मसीहा नहीं पहुचता।उन्हें देखकर बस यही दुआ उठती है की उनके ग़मों को ग़लत करने के लिए ऊपर वाले को एक रास्ता तो देना ही चाहिए था।ऐसे चोट खाये दिल वैसे ही जीते हैं जैसे सूली पर ईसा मसीह। जमाने भर की चोट खाये लगुलुहान और असीम । मुहब्बत में मर जाना एक बार है और तिल तिल कर मारना दूसरी। खैर आज के लिए अलविदा।…