पता नहीं अच्छी कविता की आपकी परिभाषा क्या कहती है पर मेरे ख़याल से एक ज़िंदा दिल ही एक अच्छी कविता लिख सकता है ।क्या है कि जब तक इंसान जिंदा न हो वह कुछ भी महसूस नहीं कर सकता।और मनहूसों से तो ऊपरवाला भी बचता है। खैर हमने आज कुछ दूसरा ही ढूंढा पढ़ने के लिए या यों कहें समझने के लिए।

हमने अपने सबसे पुराने नायक आप चाहें तो देवता कह सकते हैं ,शिव को चुना ।मंदिरों में आपने बहुत सी मूर्तियाँ देखी होंगी पर मूरत तो मूरत न चले न बोले न हँसे हमने सोचा कहीं ये जीते – जागते भी दिख सकते हैं क्या ? और बस यही सोच कर उनके बारे में लिखे गए पद ढूंढे , और सोचिए क्या मिला? कविता के शायद कुछ सबसे सुंदर नमूने । कविता के लिए जो जिंदादिली चाहिए वो दरअस्ल इसीलिये चाहिए कि आप उसे पढ़कर उसमें खो सकें। आप निकलना चाहें पर उसमें किसी ऐसी सुगंध की बात हो जिसे आपने भी महसूस किया हो। आप सर उठाना चाहें और आपको उसमें कोई ऐसी जगह मिले जहाँ आप भी कभी घूम आये हों और बस आप छोड़ ही न पाऐं उस कागज़ के टुकड़े को।भई बस इसी कारण कविता कविता होती है ।कम् से कम मुझे ऐसा लगता है। तो मुद्दे की बात पर आते हैं अब चूंकि हमने पढ़ा और देर तक वह दिमाग में चलती रही इसलिए आपको भी भेज रहे हैं , कोशिश करिए, देखिए! शायद आप इससे निकल पाएं !

लिखी तो ऐसे अपने रावण भाई साब ने है ! गो कि रचना देख कर लगता है वाक़ई इनके पास एक जिंदा दिल जरूर रहा होगा। यहां हम आपको भवार्थ भी दे रहे हैं –

जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले गलेवलंबयलंबितां भुजंगतुंग मालिकाम्।( जटाओं के बीच प्रवाहित जल से जिसका गला पवित्र है और बड़े बड़े सांपों की मालाएं जिसके गले का सहारा लेकर लटक रही हैं )

डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्रवयं चकारचंडतान्डवं तनोतु न: शिव: शिवम्।(जिसके डमरू से डम-डम् की आवाज निकल रही है और उसपर जो शिव तांडव नृत्य कर रहे हैं वो हम सबको शिवत्व प्रदान करें।)

चलिए अब भावार्थ वग़ैरह कह देने से आप गुमराह मत हो जाइए सामने वाले कि कला पर जाइये । शब्दों पर ध्यान दीजिए कैसे एक तो शब्दों के नाद से एक खास भाव पैदा किया है जो थोड़ा खुरदरा है जैसे कि शिव स्वयं हैं ज , प्र, ल, ड, च, सारे रूखे शब्द आखिर रावण ही कौन सा ख़ालिस कवि था वह खुद भी योद्धा पहले था पर उसकी दृष्टि जरूर कवि वाली थी वरना इतना पारखी और कौन हो सकता है जो इतने सांपों , काली जटाओं और डमरू की आवाज़ के बीच भी शिव के शिवत्व को देखे। कितना अपूर्व रूप जहां काली जटाओं के बीच चमकती हुई गंगा की धारा घूम रही हो और गले पर भयानक सर्पों की माला और वे साँप भी कोई चिढ़े हुए साँप नहीं हैं भयानक होकर भी शिव के शिवत्व में रमे हुए उनके ही गले पर टिके हुए हैं (अवलंब्य)भई आपकी जानकारी में कोई और इतना अपूर्व नायक हो तो सूचित करें । हम भई बारी-बारी कभी कवि तो कभी अपने नायक पर मोहित होते जाते हैं जरूर कोई जादुई बात होगी इनमें । ख़ैर ये तो रहा पहला श्लोक जो पूरी तरह भक्ति भाव वाला है तो भी इसमें शिव का शिवत्व ही गूंज रहा है इसके आगे कविता शुरू होती है । चूंकि कविता लंबी है इसलिए ब्लॉग भी लंबा होगा इसलिये आज के लिए इतना ही अगले ब्लॉग में आगे चर्चा । अगर पसंद आये तो बताएं भी लिखने वाले को भी थोड़ी ख़ुशी मिलेगी और जो आप सब इससे भी न डरें तो ऊपर हमने मनहूस लोगों के लिए भी कुछ कहा है बाक़ी आप सब समझदार लोग हैं इसलिए आज के लिए अलविदा🙏

बसंत पंचमी

यूँ तो सुंदरता अपने आप में बड़ी भ्रामक है पर जिसमें कुछ भ्रम न हो वह सुंदरता कैसी? आप खुद तज़र्बा कर सकते हैं। हमें अक्सर वही चीजें लुभाती हैं जो हमें समझ न आ रही हों, फिर बसंत तो अपने ऋतुराज ठहरे! और भरम फैलाना इनका पेशा । मतलब ग़फ़लत तो इतनी कि आपको समझ न आये भई ये गर्मी है या सर्दी ? कहीं तो पेड़ों के पत्ते गिरे हुए हैं तो कही नई कोपलें निकल रहीं हैं ! मतलब इन्होंने अकेले सारे सिस्टम को गड़बड़ कर दिया है ! पर मजाल जो किसी का अनुशासन इनपर पड़े और भई हमारी संस्कृति , वो तो इन्हें भी पूरी आस्था से पूजती है ।

ख़ैर इसकी पंचमी यानी अपनी देवी सरस्वती का दिन…कहते हैं यह दिन उन्हीं का है , फ़िर मानना भी पड़ेगा आखिर कलाओं का काम भी तो यही है । इसके साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि ये मायाजाल फैलाने का सारा व्यापार खुद उनकी देख-रेख में है इसलिए पूजनीय भी । भई हमारी संस्कृति में ये बड़ी खूबसूरत बात है हम कभी अंतरविरोधों से डरते नहीं हैं और सबको जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार करते हैं, फिर चाहे वह दृढ़ अनुशासन के साथ चपलता हो या सर्दी के साथ गर्मी या पतझड़ के साथ वसंत ।

तो चलिए आज इन सारे अंतर्विरोधों को इतनी खूबसूरती से एकसाथ बांधने वाली उन देवी को याद करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे हमें इन अंतर्विरोधों को साधने और जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने में हमें सक्षम बनाएं , हम कुछ और खूबसूरती से कुछ और तन्मयता से इसे जी पाएं । आप सबको बसंत पंचमी की शुभकामनाएं 🙏

एक नया वर्ष और

असल जिंदगी में तो नहीं पर अपनी किताबों-शिताबों में कहते हैं ‘जाने वालों से कोई गिला नही रखते’ तो फिर आप भी 2020 को खुशदिली से विदा करो।

अच्छे लोग अच्छी यादें छोड़ कर जाते हैं और बुरे लोग बुरी , पर समय के साथ उन सब का हमारी ज़िदगी में केवल इतना ही मतलब रह जाता है कि इन्होंने हमें सिखाया क्या? हमने कौन सी गलतियाँ कीं और आगे हमें इनसे क्या सीख कर निकलना है ।

जिंदगी को देखने के हमेशा दो पहलू होते हैं ,पर अक्सर हम उसके बदरंग पहलुओं पर ही देर तक अटके रह जाते हैं और दूसरे हिस्से को पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर देते हैं ।आज जब पुराना साल जा रहा है ऐसे में क्यों न हम थोड़ी कोशिश करके अपने जीवन के उन खुशनुमा पहलुओं पर भी गौर फरमाएं ।ऊपरवाले ने जो नेमतें हमें बख्शी हैं उनके लिए कभी झुककर उसे शुक्रिया अदा करें। एक बार जरा रियलिस्टिक तरीके से अपने आसपास देखें हमारा परिवार, दोस्त,रिश्तेदार खुश होने के लिए कितना कुछ है । हमारी जिंदगी में सब कुछ सुकून से चलता रहे इसके लिए यही लोग कितना कुछ करते है ,पर अगर इंसान स्वार्थी न हो तो इंसान कैसा ?सो हम भूल जाते हैं ! ऐसे भी बुरा देखने के लिए कुछ खास मेहनत तो करनी नहीं पड़ती असल मुश्किल तो अच्छा देख पाने की है । ऐसे ही तो कोई कबीर नहीं हो सकता जो कह सके ” जो मन ढूंढा आपना मोसों बुरा न कोय” ।

ख़ैर अब तो ये साल जा रहा है तो ऐसी सूखी -सूखी बातें ! भई कुछ ज्यादा ही बुरा लगेगा है कि नईं?तो चलिए लगे हाथ आने वाले साल की आवभगत भी कर लेते हैं, ऐसे भी बड़ी मुद्दत हुई हम लोगों ने कोई दुआ नहीं मांगी।

तो ऊपर वाले से सिर्फ यही प्रार्थना कि आने वाले साल में हम खुद ख़ुशनुमा बनें रहें और दुखों की काली रेखा हमसे दूर रहे। दुनिया में कुछ और इंसानियत , भरोसा और प्यार बढ़े हम और हमारी जमात अपने सपने पूरे कर सके। हममें मेहनत करने का जुनून और हौसला कभी कम न हो। हममें थोड़ा और धैर्य थोड़ी और कुशलता हो और आख़िरी , कि जो हम जैसे लिखने पढ़ने के शौकीन इसे पढ़ रहे हैं , वीणावादिनी उन्हें शब्दों को बरतने का कुछ और सलीक़ा दें।

दुआ में शामिल होना कुछ खास मुश्किल नहीं है आप भी चाहें तो बेझिझक इसमें शामिल हो सकते हैं क्या है कि कुछ अच्छा सोचने से कुछ अच्छा ही होता है!

आमीन 🙏

कविता की आस्था और आस्था की कविता

मैं भरसक टुच्चेपन से बचा रहा लेकिन

डाह से नहीं

मैं लूटपाट से अलग रहा पर

दूसरों को जब-तब बेवज़ह घायल करने से नहीं

अपना दर्द दूसरों को बताया नहीं तो

दूसरों के दर्द से बहुत द्रवित भी कहाँ हो पाया?

पवित्रता की खोज में

मैं कौन सा कलुष की चपेट से बच पाया?

अगर मुझ पर फैसला सुनाने का हक़ नहीं दूसरों को

तो दूसरों को ख़ारिज करने की आदत मुझमें कैसे सही है?

-ये पंक्तियां तथाकथित बुद्धिजीवी मनुष्य के अंतर्मन का आईना है।शुरू में (1947-50)तो नई कविता ने जब लघु मानव को प्रस्तुत किया और अज्ञेय जी ने धैर्यधन गधे को कविता में उतारा वहां चमत्कार भाव से उसे जगह दी गई पर आज की कविता में ये भाव और ज्यादा गहरा हो गया है।कवि बेचारा इंसान के भलेपन को सहेजने के लिए प्रयासरत है पर समस्या ये है कि उसे इंसान का किया कुछ भला दिखता ही नहीं ,क्या करे वो?आखिर थक हारकर वह उसके घटियापन पर एक तटस्थ टिप्पड़ी भर छोड़ देता है।उसमें कोई पक्षधरता नहीं है ,कोई आशा कोई निराशा नहीं बल्कि एक अनमना सा स्वीकारभाव ही है।ये जो खालीपन है जहां खुद के भीतर खुद से बगावत उठ रही है।व्यक्ति स्वयं अपने प्रति सहानुभूति खो चुका है ,सचमुच कविता के लिए मुश्किल घड़ी है,या आप चाहें तो कह सकते हैं कि कवि के लिए मुश्किल घड़ी है!ख़ैर

कई बार लगता है ,और मैं कहती भी रही हूँ सचमुच हम देख ही गलत दिशा में रहे हैं। बहुत कुछ सुंदर घट रहा है इसी समय में बस हमने अपना फ्रेम ही गलत पकड़ लिया है।हॉरर मूवी देखते तो मजे के लिये हैं लेकिन जब अकेले पड़ते हैं तो उसके साइड इफेक्ट्स समझ आते हैं ठीक वैसे ही।

सचमुच मुझे नहीं लगता किसी भी कवि ने बहुत सुंदर दुनिया नही देखी, चाहे कालिदास हों, चाहे तुलसी ।किसी को भी हरदम अच्छे अच्छे लोग ही नही मिले लेकिन उनमें आस्था थी कि संसार अच्छेपन से भरा हुआ है। कविता की ये एक बड़ी भूमिका थी पर हमने व्यक्ति सत्य के नाम पर ,आत्मानुभूति के नाम पर उसका भी बेड़ा ग़र्क कर दिया।सब कुछ बुरा है, वीभत्स है, चालाकी बड़ी चीज है, ईमानदारी बेवकूफी है और जाने क्या क्या? और अब जब सब तरफ़ उसी की प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है तो हमसे कान बंद करते भी नहीं बन पड़ता क्योंकि आवाज तो भीतर से ही आ रही है।

भई वाक़ई यकीन हो गया ,अपने लोग किसी और प्लेनेट से आये हों या न आएं हों,बंदर से आदमी तो नहीं ही बने। हां आजकल की स्थिति देखकर ये जरूर लगता है इंसान से वापस बंदर बनेंगे इसकी काफ़ी व्यापक संभावना है।क्योंकि अपनी महान यथार्थवादी सभ्यता उसी ओर अग्रसर है और अपने कवि तो माशाल्लाह!

‘महाजनो येन गतः स पन्थाः’

कुछ खुशी के पल

पिछले कुछ समय से ब्लॉग न तो डाल सकी और न ही पढ़ सकी इसके लिए बहुत मुआफ़ी🙏 पर इस दौरान परीक्षाएँ और साक्षात्कारों का दौर रहा। और ईश्वर की कृपा और सुधी जनों के आशीर्वाद से मेरा चयन उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग के द्वारा अस्सिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुआ।खुशी का ये पल यहां साझा किए बगैर ख़ुशी पूरी नहीं होती क्योंकि इस मंजिल की तमाम मुश्किलों और उधेड़बुन को सबसे अच्छी तरह इस ब्लॉग में ही उकेर पाई हूँ। ये सफलता उन सारी असफलताओं के बाद ही आई है इसलिए उन्हें दर्ज करना भी बनता है। 2016 में पीएचडी के एड्मिसन के साथ ही हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की स्क्रीनिंग क्वालीफाई करने से लेकर अब तक बहुत बार मंज़िल पर पहुंचने के बिल्कुल क़रीब हो कर भी कई बार मात खाई है और इसलिये कभी ये भी सोचा कि भई ये तो जैक वाली बात है और बिना उसके कुछ संभव नहीं ,जो कि मेरे रिजर्व रहने के स्वभाव के कारण संभव ही नहीं।पर अगर आप मेरी बात पर विश्वास करें, जो कि आपको करना चाहिए,साक्षात्कार के लिए निस्पृह प्रदर्शन आवश्यक होता है और बहुत बार कोई बहुत टैलेंटेड व्यक्ति भी सिर्फ अपनी डेस्परेट गतिविधियों और अतिआत्मविश्वास के कारण बाहर हो जाते हैं।ऐसे में वे ये ना समझें कि उनमें प्रतिभा नहीं है या ये कि सिस्टम करप्ट है बल्कि अपना प्रयास जारी रखें।

खैर इतने प्रवचन के बाद मुद्दे की बात अगर आप भी हमारी तरह किसी ऐसी ही तैयारी या लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं तो अपने लक्ष्य पर ध्यान रखें और जब भी कोई नकारात्मक विचार आये उसके बदले अपनी व्यक्तिगत कमियों को सुधारने का प्रयास करें ! और कृपया इसे ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे ‘ जैसा न समझ कर हमें मुआफ़ी बख्शें ।ये अनुभव मैं खुद अपने लिए भी संजों कर रखना चाहती हूँ कि अगर कभी जीवन में ऐसा दौर आये तो मैं अपनी कमियां खुद देख कर सुधार सकूँ बजाय व्यवस्था को कोसने के। आप चाहें तो मुझे बधाई दे सकते हैं । आज के लिए ये दुआ की ऊपरवाला हमें इतना चेतनाशील बनाये कि हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के पार भी उसी निःस्पृहः दृष्टि से देख सकें ।अपने व्यक्तिगत अहंकार को भी समझ सकें।आमीन!