बोझ तो ख्वाहिशों का है…

‘कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता

किसी को जमीं तो किसी को आसमाँ नहीं मिलता।’

जिंदगी का फ़लसफ़ा भी कुछ ऐसा ही है। देने वाले ने कुछ ऐसी कारीगरी से दिया है कि बटोरने को सब कुछ है पर हमारी मुट्ठियों में कुछ ही समा पाता है।जैसे ही कुछ और ढूंढते हैं कुछ न कुछ फिसल पड़ता है उसमें से। सबकुछ को साधना जैसे फिसलती हुई रेत को मुट्ठियों में भींचना है जितना ही जोर से पकड़ते हैं उतना कम बच जाता है।

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आसिफ़ा

कम्बख्त ये इंसान बड़ा चलबाज होता है और उनमे भी मर्द हो तो माशा अल्लाह!! आदमी की कुछ कैफियत ही ऐसी है, पहले मंदिर बनाता है और फिर प्रसाद चढ़वता है और उस प्रसाद को पूरी श्रद्धा से खुद गटक जाता है. अगर कभी ऐसा हो कि भगवान ख़ुद प्रसाद खाने लग जाएं, तो जनाब सच में खून खराबा हो जाएगा यकीन मानिए.

जी आप ये ना सोचें मैं क्या बातें कर रही हूं? जरा गौर फरमाईये मैं फितरत की बात कर रही हूं. ये जो आसिफ़ा नाम की बला है ना! उसकी… उसकी जिंदगी और इज्जत की बात! आप ये पूछेंगे उसका इससे क्या राब्ता? है ना राब्ता… ओलिंप द गूज का नाम सुना है? खैर अगर आप मर्द हैं तो क्यूकर सुना होगा? फ्रांसीसी क्रान्ति तो सुनी होगी! जी वही क्रांति बास्तील का किला ढहाने वालों में औरतें भी थीं. जो चाहती थीं वही समानता और स्वतंत्रता जो मर्द चाहते थे और ओलिंप उसने तो लोहा लेने की ठान ली थी जब क्रांति के बाद उसे सिर्फ हंसते चहकते मर्द दिखे जिनके लिए औरतें घर को सजाने की चीजें थी और लड़ाई का जंग खाया हथियार भर! और उसे इसका बराबर मुआवजा मिला मृत्युदण्ड के रूप में. और उसकी क्रांति भी उसके साथ ही दफन हो गई.

आसिफ़ा के नाम पर लड़ने वाले तमाम फेसबुकियों को देखकर बेसाख्ता वो याद आती है… बार बार… उन औरतों में जो इस राजनीति से बिल्कुल बेखबर हैं…आज BJP का विरोध करने के लिए आसिफ़ा हथियार है कल हिन्दुओं का खून खौलआने के लिए कोई सीता या गीता होगी. क्या फर्क पड़ता है? औरतें पहले भी हथियार थी आज भी हैं. जाने क्यूँ दूसरों को वजूद में लाने वाली औरतें ख़ुद का वजूद नहीं ढूंढ पातीं. आज तो जैसे सारे शब्द खो से गए हैं… कोई lines नहीं… बस एक दुआ है ईश्वर उन्हे शांति दे अगर उसके पास बच गयी हो!!

ख्वाहिशें

कभी-कभी हम किसी ऐसी चीज का पीछा करने लगते हैं जो कभी हमारी हो ही नहीं सकती ।बेशुमार शिद्दतों और खुद को मिटा देने वाली हिम्मत के साथ शामिल होने पर भी वो हमसे छीन ली जाती है । बड़ी ही बेदर्दी से । आधी पढ़ी हुई किसी story book की तरह जिसे पूरा जान सकना कभी मुमकिन ही नहीं होता । पर यकीन करिये ऐसी books की जगह शायद सिर्फ बंद आलमारियों में ही होती है।जहाँ वक़्त की गर्द ही इनकी सही परवरिश कर सकती है । क्योंकि उनका शायद छूट जाना ही अच्छा होता है। बेशक दर्द तो बहुत होगा पर बेवक़्त का राग आखिर कब तक गाया जा सकता है । कुछ दर्द लाइलाज़ होते हैं। पर उन्हें भूलने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ना चाहिए । अल्लामा इक़बाल की ये लाईने बेसाख्ता याद आ रही हैं-

तू शाहीन है परवाज है काम तेरा

तेरे सामने आसमान और भी हैं।

यूँ भी लग सकता है की आखिर उम्मीद क्यों छोड़ें आपनी ख्वाहिशों को पाने की ? तो जी दुनिया में ऐसे बहोत से क्यों हैं जिनका कोई जवाब नहीं है। बहते हुए पानी पर चाहे कितना ही पत्थर घिसे उससे आग नहीं निकल सकती ।और वैसे भी कहते हैं उपरवाले की बनाई इस दुनिया में कभी कोई निराश नहीं होता । हो सकता है उसके खजाने में कुछ उससे भी कीमती आपका इंतजार कर रहा हो। आमीन !!

मुखौटे और जिंदगी

कहते हैं दुनिया में जीने के दो ही तरीके होते हैं या तो खुद को एक खुली किताब की तरह बना लो या फिर एक दूसरी ही दुनिया में खुद को कैद कर बाहरी दुनिया से मुसलसल जंग करते हुए जिओ। पर क्या ही खूब होता अगर इसे चुन पाना इंसान के खुद के हाथ में होता ।

कहते हैं हमारी जो रूह होती है सदियों पुरानी होती है और चाहे जितनी पैरहन बदले उसकी अपनी पहचान नहीं बदलती ।

पर! ये नामुराद लोग , हमेशा आपको बदलना चाहते हैं । लोग प्यार करते हैं आपको उन्हीं वजहों से जो आप हो ! पर जिंदगी में आते ही सबसे पहले उन्हीं चीजों को बदलना चाहते हैं । कोई समझाए भला ! की कैसे बदलें सदियों पुरानी रूह की तासीर ! और ऐसे प्यार करने वाले लोगों का क्या करें? शायद एक रास्ता मुखौटे हो सकते हैं ,पर फिर अगर ऐसे बेजान बुतों की बातों में कोई मतलब ढूंढे तो बेसाख्ता एक आह उठती है –

अस्ल हालत का बयां जाहिर के सांचों में नहीं।

बात जो दिल में है मेरे लफ्जों में नहीं।- अफताब हुसैन

ख़ुशदिल बेवकूफ़

आपने कभी ग़ौर किया है? ये जो समझदारी है न किसी चरस की लत की तरह है जो एक बार पड़ गयी तो ताजिंदगी नहीं छूटती।आप लिपटते चले जाते हो और खो जाते हो ।बाहर से चाहे जितनी आवाजें हों अन्दर कुछ पहुँचता ही नहीं । एक झीनी छन्नी की तरह जिसमें से सब कुछ निचुड़ पड़ता है प्यार ,गुस्सा ,दुःख ठहरता कुछ भी नहीं।

यूँ तो करीने से संवारा गया नाख़ून भी अगर टूट जाये तो दिल तड़प उठता है लेकिन जो चीज भीतर तक सालती है वो शायद किसी की मासूमियत का खो जाना है । बेउम्र -बेवक़्त जैसे किसी फूल का मुरझा जाना है । ऐसा मानो किसी नम गुलाब पर किसी तेज कुल्हाड़ी का चल जाना ।पर इंसान के हालात कभी कभी जिंदगी की कीमत में उसकी मासूमियत उसकी शोखियों को छीन लेते हैं ।फिर क्या करें !जी सवाल तो बहुत हैं पर जवाब नदारद। न तो वक़्त की घिरनी को पीछे घुमाया जा सकता है न बिना कराहे दम साधे जिया जा सकता है । खैर ऐसे में यूँ ही क्यों न मान ले कि चलो न सही अपनी किस्मत में एक खुशदिल बेवकूफ़ होना,पर ऐसा मान लेने का हक़ तो कोई हमसे नहीं छीन सकता । फ़िलहाल –

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।

बेजुबां शिकायतें

हवा चराग़ बुझाने लगी तो हमने भी

दिए की लौ की जगह तेरा इंतज़ार रखा ।- मोहसिन असरार

कितना मुश्किल होता है कुछ यादों को भूल पाना। खासकर जब आप सच में ही उन्हें भूल जाना चाहें और वो किसी साख की छाल की तरह चिपक पड़े ,और उनका टुकड़ा टुकड़ा आपको लहूलुहान कर जाए । कुछ चीजें शायद इंसान के अख्तियार से बाहर होती हैं और वो सरहदें नहीं जानती बेसाख्ता सबको लपेट लेती हैं विलियम गॉल्डिंग्स फरमाते हैं_

‘a person can do what he wills,but he can not will what he wills’

पर ऐसा करने की कोशिश करना और फिर न भूल पाना एक कैद में जीने की तरह होता है जहाँ कोई मसीहा नहीं पहुचता।उन्हें देखकर बस यही दुआ उठती है की उनके ग़मों को ग़लत करने के लिए ऊपर वाले को एक रास्ता तो देना ही चाहिए था।ऐसे चोट खाये दिल वैसे ही जीते हैं जैसे सूली पर ईसा मसीह। जमाने भर की चोट खाये लगुलुहान और असीम । मुहब्बत में मर जाना एक बार है और तिल तिल कर मारना दूसरी। खैर आज के लिए अलविदा।…

जब कोई चीख

किसी अँधेरे में घुट जाती है

तो टायरों में

नाक तक भरी गयी

बेआवाज हवा की तरह

रिसती रहती है ।

चटकती धूप में

रपटीली सड़कों पर

घिसटती,कराहती ,खुरचती रहती है

और कभी कभी

उसका फटना भी बेआवाज होता है

जेठ की धूप में जले हुए

लिजलिजे रबर की तरह

जो फ़ैल जाता है

तमाम जिस्म में

मवाद की तरह

बेतरह लिबलिबा,अभिशप्त और दुर्गंधयुक्त

एक साथ ही जिसका दर्द

सभी संवेदनाओं को

जमा देता है

ठन्डे इस्पात की तरह

और फ़ैल जाता है

ग्रैग्रीन की तरह

दुर्निवार।

बरसों बाद

कभी कभी हम यूँ भी किया करते हैं

उसके हिस्से के सवाल भी खुद ही किया करते हैं

फिर देते हैं जवाब खुद ही , खुद को

सुबहों,शामों और रातों में

फिर खामखाँ

खुद की खुद से ही

शिकायत भी किया करते हैं।

ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है

क्यूँ देखेँ ज़िन्दगी को किसी की नजर से हम _साहिर

जिंदगी की तमाम मुश्किलातों में अपने सपनों और अपने विश्वासों पर अड़े रहने का हौसला देती ये lines न जाने कितने को हर रोज आगे बढ़ने की जद्दोज़हद के बीच पत्थर बन जाने से रोक लेती होंगी। और लोग कहते हैं समाज को साहित्य की क्या ज़रुरत ।हुँह😤

When you are an old soul trapped in the 21st century

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही । – शहरयार

कमबख्त झूठ कहते हैं वो लोग जो ये कहते हैं कि प्यार तो जी हम अपने उनसे करते हैं। क्या है कि प्यार तो ऐसा होता ही नहीं । ऐसा जो दीवारों में जकड़ा ,पति के शर्ट की बटन टांकता ,खाना पकाता प्यार है न सिसकते हुए कब जिंदगी से flushout हो जाता है ,पता ही नहीं चलता तो अपनी सहूलियतों को प्यार का नाम दे कर बदनाम तो नहीं किया जाना चाहिए न जी ? प्यार तो वो है जो बेमुरौवत हो ,बेसाख़्ता हो और आगे -पीछे की सोच से बेखबर हो । क्या है कि जो ख़बरदार हो तो फिर प्यार कैसा ?प्यार को जीना एक adventure को जीना है। अब आप ये मत समझ बैठना कि हम पोस्ट मॉडर्निस्ट सोसाइटी के इत्रपोश भभूके भरी चमड़ीदार मुहब्बत का जिक्र कर रहे हैं।हम तो ज़िक्र कर रहे हैं मॉडर्निज़्म के पहले ज़माने की मुहब्बत का । ख़ैर मुद्दे की बात कि हम ये भी नहीं कहते की ऐसे प्यार के सहारे जिंदगी चलती है पर जी जिंदगी अगर चलानी ही पड़ जाए तो फिर नामुराद इंसान होने की ज़रूरत ही क्या ? पेड़ पौधे ही भले जड़ , सस्ते और टिकाऊ।

कभी दिल में आये तो ऐसा सोच कर देखिये हां ईमानदारी इसकी पहली शर्त है जो दिल में फ़रेब रख कर उतरे तो फिर उफ़ान वाले दरिया से भी आप सूखे लौट आओगे ।चलते चलते_

जख्मों को रफू करके दिल शाद करें फिर से

ख्वाबों की कोई दुनिया आबाद करें फिर से ।