ख़ुशदिल बेवकूफ़

आपने कभी ग़ौर किया है? ये जो समझदारी है न किसी चरस की लत की तरह है जो एक बार पड़ गयी तो ताजिंदगी नहीं छूटती।आप लिपटते चले जाते हो और खो जाते हो ।बाहर से चाहे जितनी आवाजें हों अन्दर कुछ पहुँचता ही नहीं । एक झीनी छन्नी की तरह जिसमें से सब कुछ निचुड़ पड़ता है प्यार ,गुस्सा ,दुःख ठहरता कुछ भी नहीं।

यूँ तो करीने से संवारा गया नाख़ून भी अगर टूट जाये तो दिल तड़प उठता है लेकिन जो चीज भीतर तक सालती है वो शायद किसी की मासूमियत का खो जाना है । बेउम्र -बेवक़्त जैसे किसी फूल का मुरझा जाना है । ऐसा मानो किसी नम गुलाब पर किसी तेज कुल्हाड़ी का चल जाना ।पर इंसान के हालात कभी कभी जिंदगी की कीमत में उसकी मासूमियत उसकी शोखियों को छीन लेते हैं ।फिर क्या करें !जी सवाल तो बहुत हैं पर जवाब नदारद। न तो वक़्त की घिरनी को पीछे घुमाया जा सकता है न बिना कराहे दम साधे जिया जा सकता है । खैर ऐसे में यूँ ही क्यों न मान ले कि चलो न सही अपनी किस्मत में एक खुशदिल बेवकूफ़ होना,पर ऐसा मान लेने का हक़ तो कोई हमसे नहीं छीन सकता । फ़िलहाल –

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।

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बेजुबां शिकायतें

हवा चराग़ बुझाने लगी तो हमने भी

दिए की लौ की जगह तेरा इंतज़ार रखा ।- मोहसिन असरार

कितना मुश्किल होता है कुछ यादों को भूल पाना। खासकर जब आप सच में ही उन्हें भूल जाना चाहें और वो किसी साख की छाल की तरह चिपक पड़े ,और उनका टुकड़ा टुकड़ा आपको लहूलुहान कर जाए । कुछ चीजें शायद इंसान के अख्तियार से बाहर होती हैं और वो सरहदें नहीं जानती बेसाख्ता सबको लपेट लेती हैं विलियम गॉल्डिंग्स फरमाते हैं_

‘a person can do what he wills,but he can not will what he wills’

पर ऐसा करने की कोशिश करना और फिर न भूल पाना एक कैद में जीने की तरह होता है जहाँ कोई मसीहा नहीं पहुचता।उन्हें देखकर बस यही दुआ उठती है की उनके ग़मों को ग़लत करने के लिए ऊपर वाले को एक रास्ता तो देना ही चाहिए था।ऐसे चोट खाये दिल वैसे ही जीते हैं जैसे सूली पर ईसा मसीह। जमाने भर की चोट खाये लगुलुहान और असीम । मुहब्बत में मर जाना एक बार है और तिल तिल कर मारना दूसरी। खैर आज के लिए अलविदा।…

पत्थर दबी चीख

जब कोई चीख

किसी अँधेरे में घुट जाती है

तो टायरों में

नाक तक भरी गयी

बेआवाज हवा की तरह

रिसती रहती है ।

चटकती धूप में

रपटीली सड़कों पर

घिसटती,कराहती ,खुरचती रहती है

और कभी कभी

उसका फटना भी बेआवाज होता है

जेठ की धूप में जले हुए

लिजलिजे रबर की तरह

जो फ़ैल जाता है

तमाम जिस्म में

मवाद की तरह

बेतरह लिबलिबा,अभिशप्त और दुर्गंधयुक्त

एक साथ ही जिसका दर्द

सभी संवेदनाओं को

जमा देता है

ठन्डे इस्पात की तरह

और फ़ैल जाता है

ग्रैग्रीन की तरह

दुर्निवार।

इंतज़ार और मुंतज़िर

बरसों बाद

कभी कभी हम यूँ भी किया करते हैं

उसके हिस्से के सवाल भी खुद ही किया करते हैं

फिर देते हैं जवाब खुद ही , खुद को

सुबहों,शामों और रातों में

फिर खामखाँ

खुद की खुद से ही

शिकायत भी किया करते हैं।

ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है

क्यूँ देखेँ ज़िन्दगी को किसी की नजर से हम _साहिर

जिंदगी की तमाम मुश्किलातों में अपने सपनों और अपने विश्वासों पर अड़े रहने का हौसला देती ये lines न जाने कितनों को हर रोज आगे बढ़ने की जद्दोज़हद के बीच पत्थर बन जाने से रोक लेती होंगी। और लोग कहते हैं समाज को साहित्य की क्या ज़रुरत ।हुँह😤

When you are an old soul trapped in the 21st century

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही । – शहरयार

कमबख्त झूठ कहते हैं वो लोग जो ये कहते हैं कि प्यार तो जी हम अपने उनसे करते हैं। क्या है कि प्यार तो ऐसा होता ही नहीं । ऐसा जो दीवारों में जकड़ा ,पति के शर्ट की बटन टांकता ,खाना पकाता प्यार है न सिसकते हुए कब जिंदगी से flushout हो जाता है ,पता ही नहीं चलता तो अपनी सहूलियतों को प्यार का नाम दे कर बदनाम तो नहीं किया जाना चाहिए न जी ? प्यार तो वो है जो बेमुरौवत हो ,बेसाख़्ता हो और आगे -पीछे की सोच से बेखबर हो । क्या है कि जो ख़बरदार हो तो फिर प्यार कैसा ?प्यार को जीना एक adventure को जीना है। अब आप ये मत समझ बैठना कि हम पोस्ट मॉडर्निस्ट सोसाइटी के इत्रपोश भभूके भरी चमड़ीदार मुहब्बत का जिक्र कर रहे हैं।हम तो ज़िक्र कर रहे हैं मॉडर्निज़्म के पहले ज़माने की मुहब्बत का । ख़ैर मुद्दे की बात कि हम ये भी नहीं कहते की ऐसे प्यार के सहारे जिंदगी चलती है पर जी जिंदगी अगर चलानी ही पड़ जाए तो फिर नामुराद इंसान होने की ज़रूरत ही क्या ? पेड़ पौधे ही भले जड़ , सस्ते और टिकाऊ।

कभी दिल में आये तो ऐसा सोच कर देखिये हां ईमानदारी इसकी पहली शर्त है जो दिल में फ़रेब रख कर उतरे तो फिर उफ़ान वाले दरिया से भी आप सूखे लौट आओगे ।चलते चलते_

जख्मों को रफू करके दिल शाद करें फिर से

ख्वाबों की कोई दुनिया आबाद करें फिर से ।

जिंदगी सिर्फ जिंदगी है

ये इल्म का सौदा,ये रिसाले और ये किताबें

एक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं।

जब कोई बहुत दिल दुखाये तो क्या करना चाहिए ?

सोचा और बहुत सोचा , नतीजा ? अरे छोड़िये जनाब … जो नतीजे निकल आते ख्वाबों से भरे दिलों से तो वो इस क़दर चकनाचूर ही क्यों होते …ख़ैर! बात ये है जी की अगर कोई दिल बहुत दुखाये आपका तो खामखाँ खुद को अलगाने की जगह सौंप ही क्यों न दें उस बेमुराद को । पत्थरों को यूँ ही कोसने से बेहतर है उन्हें समझे । क्यों न सूखी हुई इस दुनिया में ख्वाबों ,हसरतों और मुहब्बतों वाले लोग फैल पड़े इस दुनिया में हुजूम बना कर और उखाड़ फेंकें सल्तनतें उन जड़े हुए बेमुरौवत जिस्मों की । बेनक़ाब कर दें उनकी रगों में बहती हुई धड़कनो को,जो ऐसा हो गया न तो जी दिल दुखाने वालों के ज़ख़्मी दिल भी सामने आ जायेंगे । निहायत ही डरपोक लोग होते है जी ये । आपने भी देखा होगा पत्थर ही चटकते हैं रेत तो जी बस फिसल पड़ती है नरम और हस्सास।

और चलती बार एक सवाल उन पत्थर दिलों से अपने दिलों को इतना बांध क्यों रखा है जी ? आपकी धड़कने ही आपको छू नहीं पाती । हमें दर्द होता है ,अपने दर्द से नहीं , काठ के इन जिस्मों में कैद बिसूरती हुई धड़कनों को देखकर । अपने पर कुछ तो रहम खाइये ।

हर एक दयार मुसाफ़िर को बेदयार मिला

या रब न वो समझें हैं न समझेंगे मेरी बात

दे और दिल उनको जो न दे मुझको जबां और ।

सचमुच कितना मुश्किल होता है बेदिलों की इस दुनिया में एक हस्सास दिल के साथ जीना ।पर इस हस्सास दिल की नामाकूल फरमाइशे आपको बदलने भी तो नहीं देतीं ज़नाब!और किसी रुख की गिरी हुई पत्ती से जो आपको मिल जाता है वो बड़े बड़े नवाबों को भी क्या ही मयस्सर!

तो लब्बोलुवाब ये कि जी ! जिंदगी में चाहे जितने पत्थर मिलें अपने दिल को यूँही दरिया बनाये रखिये ,किसी जज्बाती की बनाई इस दुनिया में क्या पता किस गली में किसी खुशदिल,बसुराख पत्थर से भेंट हो जाये और आप उसकी बारीक़ नसें तोड़कर फैल जाएं बेमुरौवत किसी बेल की तरह । उस खुशनुमा पल के इंतजार में तहे दिल से दुआ है ऐसा कोई टकरा जाए आपसे आमीन!

वलेंटाइन डे पर खास !