ख्वाहिशें

कभी-कभी हम किसी ऐसी चीज का पीछा करने लगते हैं जो कभी हमारी हो ही नहीं सकती ।बेशुमार शिद्दतों और खुद को मिटा देने वाली हिम्मत के साथ शामिल होने पर भी वो हमसे छीन ली जाती है । बड़ी ही बेदर्दी से । आधी पढ़ी हुई किसी story book की तरह जिसे पूरा जान सकना कभी मुमकिन ही नहीं होता । पर यकीन करिये ऐसी books की जगह शायद सिर्फ बंद आलमारियों में ही होती है।जहाँ वक़्त की गर्द ही इनकी सही परवरिश कर सकती है । क्योंकि उनका शायद छूट जाना ही अच्छा होता है। बेशक दर्द तो बहुत होगा पर बेवक़्त का राग आखिर कब तक गाया जा सकता है । कुछ दर्द लाइलाज़ होते हैं। पर उन्हें भूलने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ना चाहिए । अल्लामा इक़बाल की ये लाईने बेसाख्ता याद आ रही हैं-

तू शाहीन है परवाज है काम तेरा

तेरे सामने आसमान और भी हैं।

यूँ भी लग सकता है की आखिर उम्मीद क्यों छोड़ें आपनी ख्वाहिशों को पाने की ? तो जी दुनिया में ऐसे बहोत से क्यों हैं जिनका कोई जवाब नहीं है। बहते हुए पानी पर चाहे कितना ही पत्थर घिसे उससे आग नहीं निकल सकती ।और वैसे भी कहते हैं उपरवाले की बनाई इस दुनिया में कभी कोई निराश नहीं होता । हो सकता है उसके खजाने में कुछ उससे भी कीमती आपका इंतजार कर रहा हो। आमीन !!

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