मुखौटे और जिंदगी

कहते हैं दुनिया में जीने के दो ही तरीके होते हैं या तो खुद को एक खुली किताब की तरह बना लो या फिर एक दूसरी ही दुनिया में खुद को कैद कर बाहरी दुनिया से मुसलसल जंग करते हुए जिओ। पर क्या ही खूब होता अगर इसे चुन पाना इंसान के खुद के हाथ में होता ।

कहते हैं हमारी जो रूह होती है सदियों पुरानी होती है और चाहे जितनी पैरहन बदले उसकी अपनी पहचान नहीं बदलती ।

पर! ये नामुराद लोग , हमेशा आपको बदलना चाहते हैं । लोग प्यार करते हैं आपको उन्हीं वजहों से जो आप हो ! पर जिंदगी में आते ही सबसे पहले उन्हीं चीजों को बदलना चाहते हैं । कोई समझाए भला ! की कैसे बदलें सदियों पुरानी रूह की तासीर ! और ऐसे प्यार करने वाले लोगों का क्या करें? शायद एक रास्ता मुखौटे हो सकते हैं ,पर फिर अगर ऐसे बेजान बुतों की बातों में कोई मतलब ढूंढे तो बेसाख्ता एक आह उठती है –

अस्ल हालत का बयां जाहिर के सांचों में नहीं।

बात जो दिल में है मेरे लफ्जों में नहीं।- अफताब हुसैन

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