आसिफ़ा

कम्बख्त ये इंसान बड़ा चालबाज होता है और उनमे भी मर्द हो तो माशा अल्लाह!! आदमी की कुछ कैफियत ही ऐसी है, पहले मंदिर बनाता है और फिर प्रसाद चढ़वता है और उस प्रसाद को पूरी श्रद्धा से खुद गटक जाता है. अगर कभी ऐसा हो कि भगवान ख़ुद प्रसाद खाने लग जाएं, तो जनाब सच में खून खराबा हो जाएगा यकीन मानिए.

जी आप ये ना सोचें मैं क्या बातें कर रही हूं? जरा गौर फरमाईये मैं फितरत की बात कर रही हूं. ये जो आसिफ़ा नाम की बला है ना! उसकी… उसकी जिंदगी की बात! आप ये पूछेंगे उसका इससे क्या राब्ता? है ना राब्ता… ओलिंप द गूज का नाम सुना है? खैर अगर आप मर्द हैं तो क्यूँकर सुना होगा? फ्रांसीसी क्रान्ति तो सुनी होगी! जी वही क्रांति! बास्तील का किला ढहाने वालों में औरतें भी थीं. जो चाहती थीं वही समानता और स्वतंत्रता जो मर्द चाहते थे और ओलिंप उसने तो लोहा लेने की ठान ली थी जब क्रांति के बाद उसे सिर्फ हंसते – चहकते मर्द दिखे जिनके लिए औरतें घर को सजाने की चीजें थी और लड़ाई का जंग खाया हथियार भर! और उसे इसका बराबर मुआवजा मिला मृत्युदण्ड के रूप में. और उसकी क्रांति भी उसके साथ ही दफन हो गई.

आसिफ़ा के नाम पर लड़ने वाले तमाम फेसबुकियों को देखकर बेसाख्ता वो याद आती है… बार बार… उन औरतों में जो इस राजनीति से बिल्कुल बेखबर हैं…आज BJP का विरोध करने के लिए आसिफ़ा हथियार है कल हिन्दुओं का खून खौलआने के लिए कोई सीता या गीता होगी. क्या फर्क पड़ता है? औरतें पहले भी हथियार थी आज भी हैं. जाने क्यूँ दूसरों को वजूद में लाने वाली औरतें ख़ुद का वजूद नहीं ढूंढ पातीं. आज तो जैसे सारे शब्द खो से गए हैं… कोई lines नहीं… बस एक दुआ है ईश्वर उन्हे शांति दे अगर उसके पास बच गयी हो!!

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