बोझ तो ख्वाहिशों का है…

‘कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता

किसी को जमीं तो किसी को आसमाँ नहीं मिलता।’

जिंदगी का फ़लसफ़ा भी कुछ ऐसा ही है। देने वाले ने कुछ ऐसी कारीगरी से दिया है कि बटोरने को सब कुछ है पर हमारी मुट्ठियों में कुछ ही समा पाता है।जैसे ही कुछ और ढूंढते हैं कुछ न कुछ फिसल पड़ता है उसमें से। सबकुछ को साधना जैसे फिसलती हुई रेत को मुट्ठियों में भींचना है जितना ही जोर से पकड़ते हैं उतना कम बच जाता है।

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