या रब जमाना मुझ को मिटाता है किसलिए, लौह ए जहाँ पे हर्फ़ ए मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

कितनी टूटन है इन लाइनों में और दर्द ऐसा जैसे किसी तरोताजा,धड़कते हुए दिल को कोई तेज़ चीज़ चीर जाए। आख़िर ग़ालिब बनना इतना आसान भी तो नहीं।

ज़माने से इतनी शिकायत ! आख़िर क्योंकर जबकि हम खुद उसके ही टुकड़े हैं।पर जी!जो नम आंखे और जज़्बाती दिल रखते हैं, उनकी रूहें देखकर ख़ुदा भी एकबार गमख़्वार हो जाए । इतना आसान कहाँ होता है ऐसे जीना।एक शीशे का दिल , ख़्वाब भरी आंखें और नर्म जज़्बात वाली रूह आखिर चटकती,सूखती,झुलसती नहीं तो यूँ बोल भी तो नहीं पाती।इस बेजान, खुरदुरी, सख्त और बेरंग दुनिया का दिल होते हैं ऐसे लोग।तो जी बस्स! दिल को यूँ ही संभालिये। किन्ही आंखों की तरावट पढ़ डालने,और चेहरे की शिकन से रूह की तासीर जानने की अदा कोई पत्थरदिल क्या जाने और ख़ुदा की इस नेअमत को खुले दिल से अपना लीजिये जिंदगी आसान न सही खूबसूरत तो हो ही जाएगी इस दुआ के साथ। आमीन!

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उम्र -ए -दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन ,दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में

इंसान पूरी ज़िंदगी जिस एक चीज़ की ख़्वाहिश में काटता है वो शायद ‘एक मुक़म्मल भरोसा’ होता है एक ठहराव एक स्थाईपन पर दुनिया में शायद यही सबसे मुश्किल चीज़ है। क्योंकि ये शुरू ही वहां से होती है जहाँ ठहराव खत्म हो, रुकना ही यहाँ मौत है।सबकुछ बदल सकता है लोग, रिश्ते,नाम, शोहरत,पैसा कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप यकीनन अपना कह सकें।कुछ भी हो सकता है बस एक पलक के झपकने में।

आप कहेंगे बस्स!इतनी सी बात।ये तो सबको पता है।तो जी आप मुग़ालते में हैं।क्योंकि कहना एक बात है और उसे महसूस करना दूसरी।बहोत बार कहने और कर पाने की दूरी पूरी एक उम्र का फासला बन जाती है और जब चीजें सच मे हाथ से फ़िसल जाती हैं तो चाहे अनचाहे ये कड़वा सच जहन में बैठ पाता है।

खैर ये तो बड़ी बड़ी बातें हो गयी जी!बस्स कभी कभी छू जाती हैं कुछ लाइनें बेसाख़्ता और बेतावज्जो भी दिमाग में अपना घर बना लेती हैं ये लाइनें भी कुछ ऐसी ही हैं-

उम्र ए दराज़ मांग के लाये थे चार दिन

दो आरजू में कट गए तो इंतजार में।