प्रतिशोध की मानसिकता और हम

गुस्सा और दुख कभी कभी खुद उस इंसान के लिए तकलीफदेह बन जाते हैं जिसके अंदर रहते हैं इसलिए उससे जितनी जल्दी निज़ात पा ली जाए उतना बेहतर है।

कितनी अज़ीब बात है ,हमें यह लगता है कि जो हमारे साथ बुरा कर रहा है हम उसका ऐसा अहित करें कि वो बस खत्म हो जाए पूरी तरह।उसे ऐसी चोट पहुचाएं कि वो बस चित पड़ जाए।

लेकिन यदि ग़ौर करें तो लड़ना ,खत्म करने की प्रक्रिया नही है बल्कि मज़बूत करने की प्रक्रिया है।हम जिससे लड़ते हैं वह उस पल भले ही हार जाए पर हमारे अवचेतन में कही गहरे धंस जाता है , उससे हमारे मानसिक बंधन गहनतम होते जाते हैं,पर वह समाप्त तो नहीं ही होता बल्कि प्रबलतर होकर जन्म लेता है।रक्तबीज की तरह असंख्य, अगणित अनेकानेक रूपों में।

इसलिए अगर कोई नकारात्मक व्यक्ति आपसे जुड़ जाए तो उससे प्रतिशोध की सर्वोत्तम युक्ति अपने मानसिक जगत से उसके अस्तित्व का पूर्णतः विलोपन है , मानसिक वाचिक और व्यवहारिक सभी रूपों में।

Advertisements

हौसला और ज़िन्दगी

यूँ तो जब तक सांसे चलती रहें इंसान जिन्दा ही समझा जाता है पर बिना किसी चाह,हौसले और कुछ बेहतर कर गुजरने की तमन्ना के जीना भी कोई जीना है।पर कभी कभी असफलता हमें सचमुच इतना तोड़ देती है कि हम कहीं भीतर ही मर जाते हैं।लेकिन टूटना और फिर उन टूटे हुए टुकड़ों से ही खुद को जोड़कर खड़ा करना और जिंदगी की लड़ाइयों के एक नए दौर के लिए निकल पड़ना ही असल मे जीना है ।

आखिर एक ज़िन्दगी को इस दुनिया में लाने के लिए ऐसी ही कोई एक रूह , मृत्यु जैसी मर्मान्तक पीड़ा सहती है फिर उसकी इस कोशिश को धता बताकर हार मान लेने वाले हम होते कौन हैं, ऊपरवाले की तरह यहां ज़मीन पर भी एक शख़्सियत ऐसे टूटे हुए लोगों को जोड़ने की ताक़त रखती है,और हम उसे माँ कहते हैं,मुनव्वर राना जी का शेअर पेशे ख़िदमत है-

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।

देरी के लिए…

पी एच. डी अपने आप में बड़ी उलझाने वाली चीज है फिलहाल उसके एक हिस्से को पूरा करने की जद्दोजहद के बीच ब्लॉग नहीं लिख पायी ।ख़ैर आगे अपडेट जल्दी और बढ़िया करने की कोशिश रहेगी।इस बीच भी मेरी पोस्टस को पसंद करने और प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से शुक्रिया।

ये ब्लॉग मेरी आगामी पुस्तक का हिस्सा होंगे पर अपने करीबियों और गुरुजनों की बजाय मैं इस बार अनजान लोगों साहित्य प्रेमियों से जुड़ना चाहती थी। ये ब्लॉग उसी क्रम का हिस्सा है साथ ही उर्दू का लगाव भी मुझे यहाँ ले आया।बहरहाल एक बार फिर से आपको धन्यवाद।

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासे:,कोई चारसाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता।

जी ग़ालिब हैं कि यहां भी हाज़िर हैं।आजकल की दोस्ती , इंसान बाज़ आये ऐसी दोस्ती से ।चलिए आप से ही पूछती हूँ जो कोई ग़मगीन हो तो क्या करना चाहिए? उसकी गलतियां गिनानी चाहिए , यूँ न करते तो ये ना होता,तुम्हारी आदतों का सब अंजाम है,और न जाने क्या क्या…आप दोस्त न हुए काउंसलर हो गए ,कोई जो गरचे देखे तो यूँ आपको वक़ील भी समझ बैठे ,पर दोस्त ??ना वो तो ऐसे नहीं हो सकते।

दोस्ती की इस पोस्टमॉडर्न सोच से ज़रा बाहर निकलें और ग़ौर करें।एक ग़मगीन शख्स क्या चाहता है अपने दोस्त से ?

ग़लतियाँ करने वाला शख्स गर गमख़्वार है तो बहुत मुमकिन है उसे उसकी ग़लतियाँ खुद ही पता हैं,अपनी कमियां अपनी कमजोरियां बाकायदा।

ग़रचे दोस्त कुछ और ही चीज़ होते हैं ,शायद वो क़ीमती शख्स ,वो लख्ते ज़िगर, जो आपकी टूटती – लरज़ती रूह को घनी छाँव की मानिंद सींच दे,जिनकी खुलूस की गर्माहट सिकुड़ती हुई रगों को फैला दे।जो टूटकर भी जड़ों में लगी मिट्टी की तरह चिपका रहे।दोस्त शायद उसे ही कहते हैं।

माना कि यूँ दोस्त मिलना ज़रा मुश्किल है पर नामुमकिन तो नहीं।और जो न ढूंढ पाएं ऐसा तो खुद ही ऐसा बनाने की कोशिश क्यूँ न करें।जी ऊपरवाले ने गर रूह दी है तो थोड़ा रूहानी बन जाने में कुछ बुराई तो नहीं।इसी दुआ के साथ कि ये दुनिया ऐसे लोगों से भर जाए । आमीन!!

अहरनि रहे ठमूकडा,जब उठि चला लुहार

नायाब चीजें शायद अकेली ही होती हैं।यूँ तो हर हीरे को जौहरी की दरकार होती है, पर कभी कभी जीते जागते इंसान भी एक ऐसे ही जौहरी की दरकार में अपनी तमाम नेमतों को छुपाये बस पल -पल गर्क होते रहते हैं। हम इस दुनिया में जैसे आते हैं, वैसे ही चले जातें हैं, कहानी के एक आम प्यादे की तरह!बस बीच की ये खाली जगह हम भरते हैं। रंगीन धागों की तरह खिंचते ,बढ़ते ,चढ़ते और रंगते-

झीनी झीनी बीनी चदरिया

पर इसी उधेड़ने बुनने में कब जिदगी की उसी रंगीन चादर के नीचे पहुचने का वक़्त आ जाता है पता भी नहीं चलता।

आपको क्या लगता है ?क्या सचमुच इतना मुश्किल होता है खुद को पहचान पाना?अपनी अहमियत , अपनी कद्र और अपनी खासियत इसके पहले की ज़िन्दगी का सूरज अपनी शाम को पहुँच जाए फिर तो चाहे कितनी भी ख्वाहिश हो, क्या फायदा? सँवारने वाला लुहार ही जब चलने को उठ पड़ा हो, कबीर भी तो कहते हैं-

‘अहरनि रहे ठमुकडा जब उठि चला लुहार’

इसलिए जिस पल ऐसा लगे कि कुछ है खुद के भीतर कुछ ऐसा है जो सुंदर है , प्यारा है ,और आपकी अपनी आवाज़ है तो फिर ये जो आप बार – बार ख़ुद पर शक़ करते हैं ना ?उसे झटक कर बैठ जाइए उसे बुनने पिरोने और कुछ खास बनाने में।ज़िन्दगी ऊपर वाले का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है और आप खुद उसकी सबसे सुंदर कृति । दीपों की जलती हुई अवली जैसे अमावस के अंधेरे और हवाओं के बीच भी अपनी गुंदुमि , दूधिया और लपलपाती रौशनी से ही सही लोहा लेती हुई जलती रहती है वैसे ही आप भी अपने भीतर की रौशनी को यूँ ही जलाये रखें, अविरत और कर्मप्रसु बन कर ,इसी आशा के साथ-‘दीपावली की ढेर सुभकामनाएँ ‘आप सभी को!