कस्तूरी कुंडल बसै , मृग ढूंढे वन माहिं

संसार की सभी क्रांतियों में सबसे अहम क्रांति शायद अपने आप को स्वीकार कर पाना है, अपने अक्खड़पन,अनगढ़पन और तमाम मुलायमियत में और इस अद्वितीयता के आनंद को जी पाना है वर्ना तो पूरी ज़िंदगी एक अनजानी रेस के घोड़े की तरह दौड़ को जीतने की कोशिश में निकल जानी है।

और फिर ऐसा इंसान जो खुद को ही न स्वीकार सके उससे दूसरों को पहचानने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है।आज की शाम इसी उम्मीद में की हम सब जिंदगी की गहमागहमी के बीच अपनी पुरखुलूस रूह को महसूस कर पाएं आमीन!

मंज़िलों की आरज़ू

आज सिर्फ शक़ील आज़मी का ये शेर

अपनी मंज़िल पे पहुंचना भी खड़े रहना भी ,

कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़ा रहना भी।

वाक़ई सिर्फ बड़ा बनना जरूरी नही बल्कि उस बड़प्पन को बनाये रख पाना भी एक चुनौती है ।