हमसफ़र चाहिए हुज़ूम नहीं,इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे

यूँ लगता है जैसे अहमद फराज़ की ये लाइनें हम जैसों के लिए ही लिखी गईं हैं। दिलफेंकों,विदूषकों और उनसे भी न बने तो हिप्पोक्रेट्स को सराहने वाली दुनिया में अग़र आप निहायत ही चुप्पे,शर्मीले और टची हैं तो जी पक्का मान लीजिए आप पार्टियों में कोने की मेज पकड़े एक आतंकित प्राणी होंगे जिसकी नज़र घड़ी के रेंगते हुए कांटों पर होती है कि कमबख्त कब निकलेंगे यहां से! पर जी ऐसी हालत में पकड़े जाने पर लज़ा कर जल्दी निकलने की सफ़ाई देने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बल्कि ऐसे मूढ़मग़ज़ों को उनकी इन बेसिरपैर पार्टियों से बाहर अपनी दुनिया की सैर करानी चाहिए।और जो ऊब जाएं वो तो ठोंक देना चाहिए वही वाला एटीट्यूड बिल्कुल 😤 आज के लिए इतना ज्ञान शायद काफी होगा तब तक ‘नींद बड़ी चीज़ है ,मुँह ढक के सोइये जी !!

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