हथेली की छाया

मुझे डर लगता है

कि जमाना है बड़ा ख़राब

इस ओर से भी

उस ओर से भी

बचाने को है

मेरे पिता की

बस एक छोटी सी हथेली

जिसमे बराबर हैं नसीहतें

और थोड़ी डांट भी,

वैसी जिसमें शब्द नहीं होते

सिर्फ होती हैं , थोड़ी त्योरियां

बहकते हर कदम को अपने

रोक लेती हूं मैं

कि मैं जानती हूं

कितनी छोटी है ये दुनिया

और फैलते- फैलते

मेरे पिता का कलेजा

आखिर कितना नाव बनेगा

और पतवार अपनी

थामनी ही होगी

आज या तो कल

पर डर और दहशतें

मजबूत नहीं होने देतीं

अपनी पकड़ , पतवार पर !

आखिर इनकार तो नहीं कर सकती

उस डर से

जो मां के दूध के साथ

घुल जाता है रगों में

हर लड़की के

पर जानती हूं कहीं भीतर

डरना किसी दर्द का इलाज़ नहीं है

बल्कि उसका हल

दहशत के अंत में है।

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क्या आपने कभी ये महसूस किया है कि जैसे संवादों की एक ऐसी दुनिया में हम जी रहे हैं , जहां सार्थकता – निरर्थकता का ख़याल किये बगैर जोरदार बहसबाज़ी जारी है । कहना हर किसी को है पर समझना किसी को नहीं है ! हम बस लगातार एक बिजली से चलने वाले ट्यूबवेल की तरह पूरी बर्बरता से अपनी कुंठाओं की बौछार किये जा रहे हैं बेलगाम , बेमुरौवत ! बेशक़ अभिव्यक्ति हम सबका हक़ है । हम एक महान लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं पर आखिर हम सही ग़लत, सच झूट की बुनियादी समझ को इस तरह दरकिनार तो नहीं कर सकते ! किसी पोस्टमोडरनिस्ट विचारक ने कहा था कि सच भी बहुध्रुवीय हो सकता है , पर उसका असर ऐसा होगा ये शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। यहां हर एक का अपना सच है जिसे बड़ी बेशर्मी से वो दूसरे के गले उतरवाना चाहता है , और इसका अंत जाहिर है जीत उसकी होगी जिसके पास सबसे ज्यादा शक्ति होगी। पर जी अपने पूरब में ना बहुत पहले ही तुलसी ने कह रखा है ‘पंडित सोई जो गाल बजावा ‘ आजकल वही वाला हाल है। जो आप तमीज़दार , समझकर बोलनेवाले और तहज़ीब पसंद हैं ,तो इन शार्ट आप पुराने ख़याल के आदमी हैं , खैर ये तो जी अपनी बात रही ,आप किस खेमे में है विचार करें।

आखिर झुण्डबाज़ी इंसान का सबसे पुराना शग़ल है

लीक पर चलना हमेशा आसान होता है , एक लीक पकड़ लो और आपकी ज़िंदगी सेट है भई ! बने बनाये मानदंड और लोगों की भीड़ आपका साथ देने को तैयार मिलती है, जयजयकार और जुलुसबाज़ी cherry on the cake। पर ये जुलूसबाज़ी आख़िर हमें ले कहाँ जाती है?और जुलूस में शामिल हर एक को चाहे तो समवेत रूप में भेड़ कह सकते हैं, क्योंकि चराने वाला तो चरवाहा ही है ना! तो भेड़ों की अपनी समझ बूझ , अपना विवेक तो बस यही साधने में चुक जाता है कि झुंड कौन सा चुनें या फिर की झुंड में सबसे आगे रहें । आखिर झुण्डबाज़ी इंसान का सबसे पुराना शग़ल है।

मुझे पुलवामा मुद्दे पर हम भारतीय बेबस भेड़ों की तरह ही नज़र आ रहे हैं! बेशक़ कुछ युद्ध करवाने को आतुर, तो कुछ युद्ध का विरोध करने को , पर चरवाहे वो परिदृश्य से हमेशा गायब हैं बराबर,दोनों ओर के। पर हमें याद तो रखना ही चाहिए कि युद्ध होने या न होने दोनो के परिणाम हर भेंड़ को बराबर भुगतने होंगे।ख़ैर फिलहाल अपने पुरसुकून कमरे में भी अज्ञेय की ये पंक्तियां बार बार याद आ रही हैं-

“जो पुल बनाएंगे वो अनिवार्यतः पीछे राह जाएंगे

सेनाएं हो जाएंगी पार मारे जाएंगे रावण जयी होंगे राम

जो निर्माता रहे इतिहास में बंदर कहलायेंगे”

यूँ ही

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो- ,अज्ञेय

आज एक सवाल है आप सबसे, रबर की गुलेल बनाई है आपने बचपन में ? क्या मज़ा होता था उसमें , रबर को उंगलियों के बीच तानकर कंकड़ छोड़ देना वाह! बार बार खिंचना, चढ़ना ,छूटना और निढाल पड़ जाना , हमारी सेंसिटिविटी भी ऐसी ही होती है ,आखिर कभी तो उसका लचीलापन टूट सकता है,उसका टूटना रबर की सटाक!की तरह होता है, सामने वाले को बेध डालता है , आखिर उसका मज़ा जो किरकिरा हो जाता है ! भई खेल बिगड़ गया type! तो जी आपके साथ जो कभी हो जाये ऐसा तो बेवज़ह मलाल न करना और सामने वाले को इस सटाक! की चुभन को सहने देना।आज दुआ सिर्फ इसकी कि बार -बार का ये खिंचना, चढ़ना सहने की क़ुव्वत ऊपरवाला हम जैसों को बख्शे आमीन!