सपने देखते हैं आप ? भई पूछने की तो बात नहीं है ये पर लोग इतना शर्माते हैं बताने में कि ऐसा लगता है उनकी नींद में सपने ही न हों । खैर अपना तो यही सपना था कि एक दिन हम भी पढ़ें और एक ऐसी डिग्री मिले की टोपी … जी जब सपना देखा था तब उसे टोपी ही समझते थे हम… खैर तब ही ये फिक्स था लगभग बी एच यू से नहीं होगा वो … कारण वो तो साफा पहना देते हैं जी ! खैर हमने बी एच यू छोड़ जिस महबूब को अपनाया वो औवल दर्ज़े का दगाबाज़ निकला न घर का छोड़ा न घाट का दो साल की मुहब्बत एम ए की डिग्री के साथ खत्म हो गयी दिल मे बस हाय जेएनयू रह गया । खैर हमे डी यू ने अपना लिया और वो भी खुले दिल से। अपनी पीएचडी चल रही है और एम फिल भी किताब की शक्ल लेने वाली है … इस प्यार में बहोत तकलीफें भी दी हैं पर किसी ने कहा ही है ‘ सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो , सभी हैं राह में तुम भी निकल सको तो चलो ‘ । फिलहाल हम तो उस टोपी की ख्वाहिश में यहां तक आ गए …आज आप की दुआएं अपने लिए मांग रही… बाकी आप सब भी अपने सपनो की फेहरिस्त दे सकते हैं हमारी भी दुआ रहेगी ऊपरवाला उन्हें पूरा करे … आज सिर्फ अपने साथ वालो के लिए दुआएं की वो अपनी मंजिलों को पहुंचें आमीन !

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और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा – फैज़ अहमद फैज़

प्यार शायद दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द है , पर इसकी ख़लिश उसे झेल पाना सबसे मुश्किल काम ! इसीलिये तो फैज़ ने भी कह डाला –

और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।

पर शायद कोई ग़ालिब ही होगा जिसमे इस चुभन को भी इतने ख़ुलूस , सहजता और नफ़ासत से उठाने की क़ुव्वत हो।

ऐसी सिचुएशन को डील करते वक़्त ग़ालिब का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है आँखे नम भी हों और आवाज़ बुलंद भी।ग़ालिब का यह तरीका ही उन्हें खास बनाता है । क्या हुआ जो सामने वाला प्यार नही करता उनसे, ग़ालिब ने उसे छोड़ नहीं दिया शायद इसे ही हमारे यहां भोग और मुक्ति का मिलना कहा गया है , जहां महबूब ही वली हो जाता हो।

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा

कभी तू न तोड़ सकता अग़र उस्तुवार होता ।

कौन माफ़ कर सकता है ऐसे नाज़ुक मिज़ाज़ को ? पर ग़ालिब वो ऐसे वक्त भी उसे उसकी तोहमत नही लगाते ।वो एक साथ ही प्यार में भी हैं और प्यार के बाहर भी ।जिस नाज़ुकी को वो प्यार करते हैं वही उस रिश्ते को तोड़ भी डालती है पर ग़ालिब वो जानते हैंकि ये नाज़ुकी या चंचलता ही है जो उन्हें लुभा रही है और उसे ठहराते ही वो खत्म हो जाएगी ,प्यार का वो क्षण ही तभी तक है या तो प्यार की वजह खत्म हो जाएगी या प्यार का रिश्ता !जो इतना चंचल है और इसीलिए खूबसूरत भी वो क़ैद में रहेगा भी नहीं।

पर जो हो प्यार वो कर भी उसी से सकते हैं।बहरहाल !तब तक ग़ालिब की ग़ज़लों की गहराई में आप भी कुछ गोते लगाएं बेशक़ ! ग़ालिब आपको निराश नहीं करेंगे ।आज इसी दुआ के साथ कि ऊपरवाला हममें दूसरों की भावनाओं को समझने की भी क़ुव्वत बख्शे आमीन !

कलम के साथ ही हमने कूँची भी उठा ली थी तब पता नही था ये राह इतनी मुश्किल होगी।खैर कूँची तो वक़्त की धूल में गर्द खा गयी पर क़लम ने अब तक साथ नहीं छोड़ा ।फेसबुक पर डाले आठ साल हो गए बनाये हुए दस साल । कुछ चित्र आप सब के लिए भी।

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाक़ाम ही तो है , लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है – फैज़ अहमद फैज़

आदमी की एक फितरत होती है कि उसे बड़ी चीजें ही लुभाती हैं। बड़ा घर, बड़ी तनख्वाह, बड़ी गाड़ी और बड़ा सबकुछ पर जी ये बड़ापन कहीं आसमान से टपकता है क्या ?मसलन हम किसी बड़े पेड़ को देखकर सराहते जरूर हैं उसके मीठे फल हम निचोड़ डालते हैं पर उसका बीज? उसके साथ क्या करते हैं ?जी आप कहेंगे बेतरह पागलपन है !टूटा हुआ बीज किस काम का ? कचरे में ही तो जाना है उसे !

बस्स! यही है इंसान की फितरत । हमारे ज़ेहन में ये कभी नहीं आता कि बिना टूटे कोई बीज पेड़ नहीं बनता ! बिना विनाश के कोई सृजन नही होता और बिना मृत्यु के कोई जीवन नही होता ।

तब तक अपने आस पास मिलने वाले हर टूटे बीज को ( जी टूटे हुए इंसान भी बीज ही होते हैं ) आपकी तवज्जोह मिले इसी दुआ के साथ आमीन!

कुंद संवेदनों के हाथ

क्या हो , जो इंकार कर दें

बढ़ने से,

शतरंज के मोहरे,

जिसे बिठाते हो,

चलाते हो,

और कभी

हार भी जाते हो।

बदलने, बढ़ने

छोड़ने की पीड़ा

नहीं पहुँचती

उन दिमागों तक

जिनके हाथ की नसें

जवाब दे चुकी हैं

पीड़ाओं के,

संवहन को।

पर साहब जी !

विनती है एक

ये चौकोर खाने

आपके लिए हैं

खेल की बिसात ,

जिसमे हैं , हार और जीत

चित या पट

पर जी !

बस एक बार

महसूसना कभी

मर जाते हैं जो मुहरे, बेनाम

उनके भी अपने खाने होते हैं

और उस चौकोर चौहद्दी को

लांघना

केवल खेल नहीं होता।