मौत की पहली अलामत साहिब ,यही अहसास का मर जाना है – इदरीस बाबर

ज़िन्दगी का बोझ कभी कभी मज़बूत कंधों को भी झुका देता है । वक़्त और किस्मत के तकाज़े शहंशाहों को भी नहीं बख्शते तो फिर इलाज़ ? जी केवल यह कि बुरा वक्त आने पर अपनी ज़ुबान को अपने हलक में बांध कर रखें और हांथों और दिमाग़ को बेहिसाब खुला । वक़्त और क़िस्मत बदलते वाक़ई देर नही लगती!

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29 thoughts on “मौत की पहली अलामत साहिब ,यही अहसास का मर जाना है – इदरीस बाबर

      1. आप जैसे कलम के सिपाही देखना भी कम रूहानी नहीं है।आप का इस्तक़बाल हो ऐसे ही गुनगुने अल्फाजो से रोज ब रोज रूबरू कराइये जी

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      1. आलोचना तो ठीक है. मैं अक्सर बिलकुल मन की हीं बातें लिखतीं हूँ. बहुत बार बहुत से bloggers ने पूछा है – आप यह सब imagine करती है लिखने के लिए क्या ?

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