नैतिकता और कुरकुरे टाइप लोग

आपने नोटिस किया है आजकल सरलता , निश्छलता जैसे शब्द कैसे out of फैशन हो गए हैं। अगर कोई आपसे कहे कि आप तो जी बड़े सरल इंसान हैं , तो जी बोलने वाले की मिठास पर न जाएं ।दरअसल ये आजकल मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाने वाला बहुत ही सॉफिस्टिकेटेड पर्याय है!

पर फिर अगर चल रहा है तो क्या हम भी मान लें।और क्या सीधापन निरी मूर्खता का ही पर्याय है ? असल में क्या होता है कि ये महानुभाव बहोत बार सीधेपन को कोमलता से जोड़ लेते हैं जबकि होता इसके ठीक उलट है।

बेशक़ at that पर्टिकुलर मोमेंट ये एक बढ़िया सर्वाइवल टूल हो सकता है, इससे मुझे इंकार नहीं पर जो कहीं से भी मुड जाए टेढ़ा हो जाये और चूं न कसे , अपनी नाक की हड्डी की तरह!उसका क्या मज़ा? असल मज़ा तो मज़बूत टिबिया- फिबुला बनने में है जो टूट जाये पर लचकती नहीं है( गो कि हमारी वाक़ई में चटकी हुई है)

असल में क्या होता है न कि जिनकी मेजोरिटी होती है , वो अपना एक नरेटिव बना लेते हैं।, फिर बाकी भेड़ें क्या करती हैं ? वो उसे दुहराती हैं बें बें बें बस्स! न हो भरोसा तो किसी एक भेड़ को पकड़कर तौल लीजिए।ये भेड़ें हैं!जो मजबूत करती हैं किसी भी नरेटिव को और मुश्किल चीजें वो तो भई भेड़ों के भेड़पन के बस की नहीं होतीं।

बस यही कारण है कि चतुराई या टेढ़ापन इतना इन ट्रेंड है। जब लोगों में दम ही न हो सीधे जीने का तो लोग टेढ़ेपन के ही उपासक होंगे, और सीधेपन को मूर्खता मानेंगे।सच मानने में ईगो जो हर्ट होता है।

फिर ऐसे में क्या करते हैं वो? एक तरीका ये कि नैतिक लोगों को सीधा और मूर्ख कह कर टाल दें और दूसरा कि अनैतिकता को महिमा मंडित कर दें।पर होंगे तो दोनों ही मनोविनोद के साधन।क्या है कि सच ही सबसे लंबे समय तक टिकता है, हर मुलम्मे के घिसने के बाद भी।

तो जी अगर आप हम जैसे पहली कैटिगरी में आते हैं तो अगली बार मिल जाये कोई ऐसा बिंगो मैड ऐंगल्स ! कुरकुरे (टेढेमेढे) टाइप पर्सनलिटी तो जमा दीजिये एक सीधा 180° का हथौड़ा! अगर आप पूछें कि इसके दरमियाँ ?तो जी तब तक स्वस्थ रहें ! मस्त रहें और बेशक़ व्यस्त रहें!

( साहित्यिक प्रलाप के बीच मध्यांतर आवश्यक हैं !ऐसे भी दिल्ली विश्वविद्यालय इस तरह के ज्ञान का स्वीट – सार मिक्सचर है, कुछ ज्ञान गंगा प्रवाह इधर भी स्वाभाविक ही है।लाइव फ्रॉम डी. यू. लाइब्रेरी)

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मांझे मांझे चलो रे पंथी! मांझे – मांझे!

नयापन क्या है ?शायद केवल एक भ्रम !कभी आप उस सीमा तक पहुचें तो महसूस कर पाएंगे कि नयेपन की हर कोशिश असल में पुराने का ही दुहराव है।तो फिर आप कहेंगे ये नयापन जो हम महसूस करते हैं वो क्या है ? तो मैं कहूँगी वो एक नए बिंदु से उसी घेरे का वापस दुहराव ही है। सिरे का नयापन छोर का नयापन तो नहीं होता न !इससे तो सहमत होंगे आप।पर क्या होता है जब हम नयेपन की थका देने वाली तलाश में निकलते हैं और बहुत घूम – फिरकर भी बार -बार वहीं पहुँच जाते हैं। इसकी पीड़ा कैसी होती है? वैसी ही शायद जैसे किसी पिंजरे में कैद पंछी की!जब तक हम उस सीमा तक नहीं पहुँचते सब कुछ सुंदर और भव्य लगता है पर वहां पहुचकर ही वो मज़बूत बेड़ियां नज़र आती हैं।बाबा की कही ये लाइनें जो शायद टैगोर की हैं ज्यादा तसल्ली देती हैं-

‘मांझे मांझे चलो रे पंथी, मांझे मांझे!’

सचमुच सबसे अच्छा तो मध्यमार्ग ही है अतिवाद हमें कहीं नहीं पहुचाते फिर चाहे वो अतिवाद नयेपन का ही क्यूं न हो ।

संरचनावादी यूँ ही तो नहीं कहते कि हम उतना ही बोल सकते हैं जितना समझ सकते हैं, और उसे ही पलट दें तो उतना ही समझ सकते हैं जितना बोल सकते हैं।क्या हुआ ? क्या आपने भी महसूस किया ?कितना संकुचित है तथकथित हमारा ज्ञान का व्यापार ! बुद्धि की ये सारी खीचतान ही भाषा की गिरफ्त में है।

पर फिर भी मुद्दे की बात कि हमारे आदमीपन की सीमा केवल हमारी बुद्धि नहीं है ।हमारी चेतना उससे कहीं बड़ी ,हमारी संवेदनशीलता उससे कहीं अधिक महनीय है।

बहुरि नहिँ आवना एह देस- कबीर

अच्छा आपने कभी सोचा है कि ऐसा हो कि ये दुनिया बस हमारी एक खामखयाली हो । किसी नींद का ऐसा सपना हो जो घुप्प! और उठते ही टूट जाये।मतलब मान लो आप ! तो क्या हो ?मुझे बचपन में बार- बार ऐसा लगता था, ऐसा लगता जैसे सारे अपने पीछे छूट जाएंगे माँ- पापा सब , नींद से ही डर लगता था।

फिर धीरे- धीरे समझ आया ये दुनिया भी सच है और पारदर्शी चाहे भले हो पर बेतरह कसी हुई है । हमारे विचारों ,कर्मों ,भावों का एक मजबूत जाल है जो हमें टस से मस नहीं होने देता ।जितनी लंबी याद्दाश्त उतना मजबूत और घना ज़ाल । किसी कॉमिक्स के चरित्रों की तरह हम सब इस 3 डी दुनिया की चित्त – पट में छपे डूबते – तैरते रहते हैं।

आप कहेंगे क्या बेतुकी बातें हैं , पर ऐसा है नहीं , आपके काम की बात भी बता सकती हूं , तो वो ये कि हो सकता है आपने न सोच हो कभी ऐसा!पर आप ऐसा सोचने की कोशिश तो ज़रूर ही कर सकते हैं।

और देखिए ना!कोशिश करते ही ये जाले कमजोर पड़ जाते हैं। जैसे मूवी हॉल में अंधेरा हो जाता है , हम खो भी जाते हैं उस चल रही मूवी में ,पर फिर भी हम होते हैं , बेतरह जाग्रत! वैसे ही दुनिया , लोग रिश्ते- नातों के बीच भी हम उनके अलावा भी कहीं है।अकेले लेकिन जाग्रत और स्वस्थ(स्व+अस्थ)।

आज दुआ सिर्फ इतनी कि ज़िन्दगी की गाड़ी में चलते-चलते हम खुद को गाड़ी ही न समझ लें। साथ वालों की जरूरतें पूरी ज़रूर करें पर अपनी अस्मिता के एवज में नहीं !

काश की सचमुच दुनिया कोई ऐसा देश होती , जिसमें आने और जाने की चाबी हमारे हाथ में होती ।ख़ैर अंत में कबीर की ये लाइनें –

बहुरि नहिं आवना एहि देश

जो जो गए बहुरि नहिं आये।

पठवत नाहीं संदेस

बहुरि नहिं आवना एहि देस।

हमारा समय और बाँझ कामधेनुएँ

अगर कोई आपसे कहे कि ‘मदद करना बड़ी बात है’ तो आप मान लेंगे।कि हां भई ! जिसके पास शक्ति है , संसाधन है अगर वह आगे बढ़कर किसी की मदद करता है ,तो फिर ये तो बड़ी बात है ।

ऐसा ही है ना ? पर जी मुझे ऐसा नहीं लगता , आप कहेंगे क्यूं भला ? तो जी ऐसा यूँ कि कभी कभी मदद लेने वाला भी बड़ा हस्सास और खुद्दार हो सकता है , और मदद करने वाला अव्वल दर्जे का मौकापरस्त और काइयाँ । और ऐसा नहीं है कि ख़ाली मुझे ही ऐसा लगता है अपने कवि हुए थे एक विजय देव नारायण शाही उन्होंने भी शायद कभी महसूस किया होगा कुछ ऐसा , जो ये लाइनें लिखीं –

बाँझ कामधेनुएं

रंभाती हुई आयीं

और मेरे चारों ओर आकर ठहर गयीं

इस उम्मीद में कि मैं उनसे कुछ माँगूँगा

मुझे सिर्फ घिर जाने की तकलीफ हुई

और मैं उनकी आंखों से आंखे मिलाये घूरता रहा।

(मछलीघर , पेज 30)

तो फिर ? ऐसे में हमारा पुराना समीकरण ही गड़बड़ा जाता है । रहीम के शब्दों में कहें तो जिस मेहंदी बांटने वाले के मन मे मेहंदी के रंग की चाह हो ,तो फिर वो बाँटनहार ही काइयाँ है,और आजकल तो इसकी व्याख्या सहज जीवन में ही सुलभ है।

बहरहाल आज ये दुआ कि जो कभी हम उस मदद करने वाली की भूमिका में हों ,तो मन के इस काइयाँपन को बाहर कर कुछ सकारात्मक करें ,ऐसे भी ये दुनिया क्षणभंगुर है इसकी मान, प्रतिष्ठा, धन सब ।तो जी मदद करते वक़्त इसे भी ध्यान रखें यहां भूमिकाएं चुटकियों में बदल जाती हैं।ऊपरवाला जिंदगी के तमाम कड़वेपन के बीच हममें कुछ मासूमियत भी बख्शे और ये दुनिया नरमदिल मददगारों से कभी खाली न हो !आमीन!

तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये ,यूँ न था मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये।- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बुद्ध बड़े दुखी हुए थे इस दुनिया से उन्होंने कहा ये संसार दुखमय है उन्होंने इससे निकलने की राह भी दिखाई।हमारा दर्शन भी दिखाता है जहां मन कि भागदौड़ के बीच संतुलन और नियंत्रण की तालीम दी जाती है । वो कहते हैं दुख अपनी जगह है और उसे अपने ऊपर लादे रखने की ख्वाहिश अपनी जगह।दुख लाज़मी है दुख को थोपे रखना बेवकूफ़ी। बेशक़ वो बेवकूफ़ कोई भी नहीं बनना चाहता । मैं ना नहीं कहती इससे। यही एक मुक़म्मल इलाज़ है दुखों का कि उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।

पर कवि और कलाकार वो ?उनकी तो पूँजी ही यही है सोचना और सोचना और खोये रहना पर हद तो हर चीज की होती है तो फिर दर्द और दुख की भी तो होती होगी। कलाकार भी तो इनसब के बीच जीते हैं।शायद इसीलिए वो जितने संवेदनशील होते हैं उतने ही निःस्पृह भी।इस दो तरफा गुंथाव को केवल वो ही सह सकते हैं जहां सहना भी हो और जिंदा भी रहना हो रचना भी हो।रंगीनियों, शोखियों और सम्वेदनाओं के घनीभूत टुकड़े पर उतने ही विलग ,सहने और रचने की इसी बुनियाद में रहते हैं वो ।

फ़ैज़ जब कहते हैं कि तेरे मिलने से मेरी तक़दीर बदल जाये मैंने ऐसा नहीं चाहा केवल चाहा था कि ऐसा हो जाये, कितने पेंचीदा लगते हैं। मिलना चाहना तो आम इंसानों की बात है पर फ़ैज़ के लिए तो वो महज़ एक बेकायदा बेतवज्जो चीज़!उनके लिए मिलने की चाहत ही सबसे अहम है, उनके भीतर के कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी।

पर जी! मुद्दे की बात कि कलाकारों और दार्शनिकों के बीच हम जैसों के लिए इसमें क्या धरा है भई?तो जी ये कि हम जो बिना गाड़ी के पहिये कभी इधर तो कभी उधर चढ़ते उतरते फिरते हैं , कभी अपने पहियेपन के बाहर , घडी भर ठहरकर जिंदगी को महसूस करें। ज़िन्दगी आखिर इतनी बुरी भी नहीं!चाय में पड़ी हुई शक्कर की तरह दुःख भी इसी ज़िन्दगी के रंग हैं उन्हें महसूस करिये , और शिकायतों के पिटारे को ज़रा किनारे कर दूसरों को भी समझने की क़ूवत रखिये।आज फ़ैज़ की इस ग़ज़ल के साथ यही दुआ कि हम सब ज़िन्दगी की दुश्वारियों में भी अपनी रूहानी चमक बनाये रख सकें आमीन!

सफ़लता का सच और सच की सफ़लता

पता नही आपके मन मे यह द्वंद्व कभी उत्पन्न होता है या नहीं कि सफलता का मतलब क्या होता है ? उचित और अनुचित की हमारी परिभाषा क्या वाक़ई में कोई मायने रखती है ? क्या कोई ऐसे वैचारिकी है जो यह बताती हो कि सफलता किसे कहें सफल किसे माने । अगर ध्यान दें तो वाकई सफलता निरपेक्ष होती है। एफर्ट ही जीतते है अंततःसद्भावना या दुर्भावना नहीं । शायद हमारी दुनिया ही इस तरीके से बनी है , इस इतनी बड़ी दुनिया ने हम अदने से प्राणी ये कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि ये सच है ये झूट है ये उचित है ये अनुचित है । अपने भारतीय मिस्टिक्स ही सही कहते हैं दुनिया की प्रकृति ही नूट्रल है जो बीज बो दिया वही फलेगा बिना भेदभाव के चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक ।और हम कौन होते हैं किसी एक को भी ग़लत कहने वाले । शायद जो चीज मैटर करती है वो कर्म या एफर्ट है जो भी आप बनाना चाहें आप स्वतंत्र है ।बस रेस्पॉन्सिबिल्टी से आप पीछे नहीं हट सकते। सकारात्मकता पर इतना जोर शायद इसीलिए हमारी परंपरा में इतना अधिक रहा है। भई कुल मिलाकर यही बात मुझे ठीक जान पड़ती है कि डार्विनिज्म ही सही कहता है ” सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट” की थ्योरी ही सही है। कृष्ण तो पहले ही कह गए थे गीता में दिनकर के शब्दों में कहें तो ‘योग्य जान जीता है , पश्चिम की उक्ति नहीं गीता है ! गीता है !’ शब्द चाहे जो हो सच यही है । बहरहाल चाहे अपनी जिंदगी हो या बाहरी दुनिया कहीं भी अप्लाई करें और आप भी समझें! वैसे कहने वाले विचारक बेशक़ इसे उत्तरआधुनिकता की एक गर्हित विशेषता ही कहेंगे क पर जी जो दिखता है उसे झुठलाया कैसे जाए! खैर आज बस यही दुआ की हम सब सकारात्मक की ओर एक कदम जरूर बढ़ायें और ऊपर वाला मदद करे हमारी इसमे ! आमीन!