रचनाएं हमें बांधती नहीं वरन मुक्त करती हैं

पेंटिंग छोड़ रखी थी शायद इसलिए कुछ बहुत अच्छी नहीं बनी पर कोशिश जारी है –

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सफ़लता का सच और सच की सफ़लता

पता नही आपके मन मे यह द्वंद्व कभी उत्पन्न होता है या नहीं कि सफलता का मतलब क्या होता है ? उचित और अनुचित की हमारी परिभाषा क्या वाक़ई में कोई मायने रखती है ? क्या कोई ऐसे वैचारिकी है जो यह बताती हो कि सफलता किसे कहें सफल किसे माने । अगर ध्यान दें तो वाकई सफलता निरपेक्ष होती है। एफर्ट ही जीतते है अंततःसद्भावना या दुर्भावना नहीं । शायद हमारी दुनिया ही इस तरीके से बनी है , इस इतनी बड़ी दुनिया ने हम अदने से प्राणी ये कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि ये सच है ये झूट है ये उचित है ये अनुचित है । अपने भारतीय मिस्टिक्स ही सही कहते हैं दुनिया की प्रकृति ही नूट्रल है जो बीज बो दिया वही फलेगा बिना भेदभाव के चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक ।और हम कौन होते हैं किसी एक को भी ग़लत कहने वाले । शायद जो चीज मैटर करती है वो कर्म या एफर्ट है जो भी आप बनाना चाहें आप स्वतंत्र है ।बस रेस्पॉन्सिबिल्टी से आप पीछे नहीं हट सकते। सकारात्मकता पर इतना जोर शायद इसीलिए हमारी परंपरा में इतना अधिक रहा है। भई कुल मिलाकर यही बात मुझे ठीक जान पड़ती है कि डार्विनिज्म ही सही कहता है ” सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट” की थ्योरी ही सही है। कृष्ण तो पहले ही कह गए थे गीता में दिनकर के शब्दों में कहें तो ‘योग्य जान जीता है , पश्चिम की उक्ति नहीं गीता है ! गीता है !’ शब्द चाहे जो हो सच यही है । बहरहाल चाहे अपनी जिंदगी हो या बाहरी दुनिया कहीं भी अप्लाई करें और आप भी समझें! वैसे कहने वाले विचारक बेशक़ इसे उत्तरआधुनिकता की एक गर्हित विशेषता ही कहेंगे क पर जी जो दिखता है उसे झुठलाया कैसे जाए! खैर आज बस यही दुआ की हम सब सकारात्मक की ओर एक कदम जरूर बढ़ायें और ऊपर वाला मदद करे हमारी इसमे ! आमीन!

मौत की पहली अलामत साहिब ,यही अहसास का मर जाना है – इदरीस बाबर

ज़िन्दगी का बोझ कभी कभी मज़बूत कंधों को भी झुका देता है । वक़्त और किस्मत के तकाज़े शहंशाहों को भी नहीं बख्शते तो फिर इलाज़ ? जी केवल यह कि बुरा वक्त आने पर अपनी ज़ुबान को अपने हलक में बांध कर रखें और हांथों और दिमाग़ को बेहिसाब खुला । वक़्त और क़िस्मत बदलते वाक़ई देर नही लगती!

माँझी तोरा नाम तो बता

आज बस ये चित्र जो शायद सालों बाद बनाया है और मेरे पसंदीदा ऋतुपर्णो दा का ये गीत जिसे सुनते हुए बनाया है –

शाम ढले सखियाँ सब लौट गयीं सारी

अकेले हम नदिया किनारे

माँझी तोरा नाम तो बता

फिर कैसे पुकारें ! तुझे कैसे पुकारें …

अकेले हम नदिया किनारे

टूटे मेला सावन बेला

आई जमुना किनारे

माँझी तोरा नाम तो बता

फिर कैसे पुकारें , तुझे कैसे पुकारें …

सपने देखते हैं आप ? भई पूछने की तो बात नहीं है ये पर लोग इतना शर्माते हैं बताने में कि ऐसा लगता है उनकी नींद में सपने ही न हों । खैर अपना तो यही सपना था कि एक दिन हम भी पढ़ें और एक ऐसी डिग्री मिले की टोपी … जी जब सपना देखा था तब उसे टोपी ही समझते थे हम… खैर तब ही ये फिक्स था लगभग बी एच यू से नहीं होगा वो … कारण वो तो साफा पहना देते हैं जी ! खैर हमने बी एच यू छोड़ जिस महबूब को अपनाया वो औवल दर्ज़े का दगाबाज़ निकला न घर का छोड़ा न घाट का दो साल की मुहब्बत एम ए की डिग्री के साथ खत्म हो गयी दिल मे बस हाय जेएनयू रह गया । खैर हमे डी यू ने अपना लिया और वो भी खुले दिल से। अपनी पीएचडी चल रही है और एम फिल भी किताब की शक्ल लेने वाली है … इस प्यार में बहोत तकलीफें भी दी हैं पर किसी ने कहा ही है ‘ सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो , सभी हैं राह में तुम भी निकल सको तो चलो ‘ । फिलहाल हम तो उस टोपी की ख्वाहिश में यहां तक आ गए …आज आप की दुआएं अपने लिए मांग रही… बाकी आप सब भी अपने सपनो की फेहरिस्त दे सकते हैं हमारी भी दुआ रहेगी ऊपरवाला उन्हें पूरा करे … आज सिर्फ अपने साथ वालो के लिए दुआएं की वो अपनी मंजिलों को पहुंचें आमीन !

और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा – फैज़ अहमद फैज़

प्यार शायद दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द है , पर इसकी ख़लिश उसे झेल पाना सबसे मुश्किल काम ! इसीलिये तो फैज़ ने भी कह डाला –

और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।

पर शायद कोई ग़ालिब ही होगा जिसमे इस चुभन को भी इतने ख़ुलूस , सहजता और नफ़ासत से उठाने की क़ुव्वत हो।

ऐसी सिचुएशन को डील करते वक़्त ग़ालिब का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है आँखे नम भी हों और आवाज़ बुलंद भी।ग़ालिब का यह तरीका ही उन्हें खास बनाता है । क्या हुआ जो सामने वाला प्यार नही करता उनसे, ग़ालिब ने उसे छोड़ नहीं दिया शायद इसे ही हमारे यहां भोग और मुक्ति का मिलना कहा गया है , जहां महबूब ही वली हो जाता हो।

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा

कभी तू न तोड़ सकता अग़र उस्तुवार होता ।

कौन माफ़ कर सकता है ऐसे नाज़ुक मिज़ाज़ को ? पर ग़ालिब वो ऐसे वक्त भी उसे उसकी तोहमत नही लगाते ।वो एक साथ ही प्यार में भी हैं और प्यार के बाहर भी ।जिस नाज़ुकी को वो प्यार करते हैं वही उस रिश्ते को तोड़ भी डालती है पर ग़ालिब वो जानते हैंकि ये नाज़ुकी या चंचलता ही है जो उन्हें लुभा रही है और उसे ठहराते ही वो खत्म हो जाएगी ,प्यार का वो क्षण ही तभी तक है या तो प्यार की वजह खत्म हो जाएगी या प्यार का रिश्ता !जो इतना चंचल है और इसीलिए खूबसूरत भी वो क़ैद में रहेगा भी नहीं।

पर जो हो प्यार वो कर भी उसी से सकते हैं।बहरहाल !तब तक ग़ालिब की ग़ज़लों की गहराई में आप भी कुछ गोते लगाएं बेशक़ ! ग़ालिब आपको निराश नहीं करेंगे ।आज इसी दुआ के साथ कि ऊपरवाला हममें दूसरों की भावनाओं को समझने की भी क़ुव्वत बख्शे आमीन !

कलम के साथ ही हमने कूँची भी उठा ली थी तब पता नही था ये राह इतनी मुश्किल होगी।खैर कूँची तो वक़्त की धूल में गर्द खा गयी पर क़लम ने अब तक साथ नहीं छोड़ा ।फेसबुक पर डाले आठ साल हो गए बनाये हुए दस साल । कुछ चित्र आप सब के लिए भी।

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाक़ाम ही तो है , लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है – फैज़ अहमद फैज़

आदमी की एक फितरत होती है कि उसे बड़ी चीजें ही लुभाती हैं। बड़ा घर, बड़ी तनख्वाह, बड़ी गाड़ी और बड़ा सबकुछ पर जी ये बड़ापन कहीं आसमान से टपकता है क्या ?मसलन हम किसी बड़े पेड़ को देखकर सराहते जरूर हैं उसके मीठे फल हम निचोड़ डालते हैं पर उसका बीज? उसके साथ क्या करते हैं ?जी आप कहेंगे बेतरह पागलपन है !टूटा हुआ बीज किस काम का ? कचरे में ही तो जाना है उसे !

बस्स! यही है इंसान की फितरत । हमारे ज़ेहन में ये कभी नहीं आता कि बिना टूटे कोई बीज पेड़ नहीं बनता ! बिना विनाश के कोई सृजन नही होता और बिना मृत्यु के कोई जीवन नही होता ।

तब तक अपने आस पास मिलने वाले हर टूटे बीज को ( जी टूटे हुए इंसान भी बीज ही होते हैं ) आपकी तवज्जोह मिले इसी दुआ के साथ आमीन!