हवाएँ/ The wind

I listen to the wind

To the wind of my soul

Where I’ll end up

Well, I think only God really knows!

– Cat Stevens

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कभी तो चांद उतरे आसमाँ से जाम हो जाये, तुम्हारे नाम की एक खूबसूरत शाम हो जाए- बशीर बद्र

फ़ोटो- मेरी

चांद- ? बादलों का

बादल सांझ और हम…

Book review/summary

चारु गुप्ता की ये बुक पुराने यू पी में स्त्री संबंधी चिंतन पर विचार करती है । 17 शीर्षकों में बंटी हुई ये बुक ऐसे तो कई स्तरों पर आधुनिक दौर में पितृसत्ता के निर्माण के सूक्ष्म पहलुओं पर विचार करती है पर इस संदर्भ में स्त्री की आदर्श छवि और उसके निर्माण और नियंत्रण के दोनों माध्यमो ( सुधारवादी, हिन्दू पुनरुत्थानवादी ) की चर्चा करती है।बुक में स्त्री की यौनिकता के नियंत्रण के संदर्भ में नई नई शुरू हुई प्रेस,प्राच्यवादी प्रभाव,और राष्ट्रीयता के निर्माण के संदर्भ में स्त्री छवि की पुनर्निर्माण या ठीक कहें तो संशोधन पर विचार करती है।जिसमे महिलाओं के लिए अलग तरह की शिक्षा, अलग सामाजिक ,घरेलू मानदंड पर विस्तार से बात की गई है।इसके अलावा तत्कालीन सुधारकों के दोमुहे रवैये की भी अच्छी खबर ली गयी है।ये तो रहीं अच्छी अच्छी बातें ।

अब कुछ कमियां – एक तो चारु ये मानती हैं कि रीतिकालीन या कहें तो मध्यकालीन दौर में भी स्त्री यौनिकता एक टैबू थी ,जो दरबारों की चर्चा तक सीमित थी जबकि स्वयं ही अपने अध्ययन में बता रहीं हैं कि स्त्री के तत्कालीन (19 वीं सदी) के स्पेस को कम किया जा रहा था।ऐसे में ये बात समझ के बाहर है खैर उन्होंने सिर्फ इसे अपना assumption माना है और ये बात भूमिका में कही है पर इसलिए इसे niglect भी नहीं कर सकते क्योंकि बिना तथ्य के तो कुछ भी अवधारणा ले कर चला जा सकता है।

चारु के अध्ययन को ही आगे बढ़ते हुए सुधीश पचौरी उत्तरआधुनिक विचारक फूको से उधार लेकर बताते हैं कि सुधारकों ने ऐसा क्यों कहा। रीतिकाल ( हिंदी में यह 1700 से 1900 विक्रमी संवत के बीच का समय है)इनके अध्ययन ला केंद्र है और इनकाअनं है कि जैसा कि फूको कहते हैं जब भी किसी काल विशेष को अलगाने का प्रयास किया जाता है अनिवर्यतः पुराने वाले को हेय सिद्ध करना ही होता है।सुधारकों ने इसी संदर्भ में ऐसा किया।सुधीश जी (शायद पार्थ चैटर्जी के राष्ट्रवाद संबंधी चिंतन को सही मानते हैं, शायद इसलिए कि मैंने अभी इस बारे में ज्यादा नहीं पढ़ा, आगे अपडेट करूँगी) चारु से अलग ये मानते हैं कि रीतिकाल अपेक्षाकृत स्त्री यौनिकता की दृष्टि से अधिक उदार था, वहां कहीं अधिक स्पेस उपलब्ध था, स्त्री शरीर पुरुषों के लिए कम से कम इतना भय नहीं उत्पन्न कर रहा था कि उसे नियंत्रित करने की आवश्यकता उन्होंने समझी हो। पचौरी जी रीतिकविता के उद्धरण भी देते चलते हैं जहां आर्थिक रूप से सम्पन्न और डोमिनेटिंग स्त्री भी मौजूद है। हालांकि इस संदर्भ में बहोत कुछ कहा जा सकता है पर यहां इतना ही कि पचौरी जी ने इस तथ्य1 पर ध्यान नहीं दिया कि ऐसे डोमिनेटिंग चरित्र वाले1 पात्र किरने कम है।मात्रा का विचार अगर छोड़ दें तो कम से कम इसे सूचित किया जाना चाहिए कि यहां एक्सेप्शन की बात हो रही है जबकि मेजोरिटी मुग्धा नायिकाओं की है जिनकी उम्र 16 से भी कम है, और उनका पूरा व्यक्तित्व उन सुंदर अंगों के विलास पर निर्भर है जो चमड़ी के भीतर उनकी आत्मा से कोसों दूर है।

आलोचना के संदर्भ यहां दिए हैं और छोटी सी समरी अच्छी लगे तो बताएं, बाक़ी अगर कहीं लगे कि अनुचित या तर्क की संभावना है बहस की जा सकती है। ( मिथ वाली बुक्स एक बार में समझ नहीं आईं अभी उनको दुबारा पढ़ना होगा। समझ बनते ही यहां डालूंगी )

( कुछ टायपिंग एरर हैं माफ करियेगा, समय मिलते ही सुधार करूँगी)

किताबें और किताबें

1.रीतिकाल और सेक्सुअलिटी का समारोह,( रीतिकाल में फूको विचरण), सुधीश पचौरी

2.स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक,(औपनिवेशिक भारत में यौनिकता और साम्प्रदायिकता), चारु गुप्ता

3.Myth, Laurence coupe

4.Myth and Mythmaking ,H A Murray

इस बीच पढ़ी गयी पुस्तकों की सूची , हालांकि चौथी अभी बाकी है, पर पूरी होते ही …इन बुक्स की समरी ब्लॉग पर डालूंगी।और एक किसी साहित्यिक रचना के संबंध में ।इन किताबों में कोई आपको पसंद हो तो देख सकते हैं बहरहाल हैं तो ये मेरे शोध कार्य से संबंधित पर ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती…आप सब भी आजमा सकते हैं। अगर संभव हो तो अपनी पसंद की किताबों के नाम भी बताएं जिन्हें आप सब पढ़ रहे हों इस दौरान.

मेरी कोशिश आगे से यह होगी कि हिंदी की जो बुक्स मैं पढ़ती हूँ उनका रिव्यू यहां देती चलूँ। हो सकता है ये बहुत साहित्यिक न हो ,ऐसे में आप चाहें तो अनफॉलो कर सकते हैं।गो कि कोशिश रहेगी कि इस बीच भी साहित्यिक लेखन जारी रहे!

टूटी हुई बिखरी हुई चाय की , दली हुई पाँव के नीचे पत्तियाँ मेरी कविता – शमशेर

( #गर्म शामें#बिखरी पत्तियां#शमशेर की कविताई)

फ़ोटो मेरी , भाव शमशेर के

टूटी हुई बिखरी हुई चाय की

दली हुई पाँव के नीचे पत्तियाँ मेरी कविता

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हाँ तुम मुझसे प्रेम करो

जैसे मछलियां लहरों से करती हैं

जिनमें वह फंसने नहीं आतीं।

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

जिनको वह गहराई तक दबा नहीं पाती हैं।

तुम मुझसे प्रेम करोजैसे में तुमसे करता हूँ।- शमशेर

नैतिकता और कुरकुरे टाइप लोग

आपने नोटिस किया है आजकल सरलता , निश्छलता जैसे शब्द कैसे out of फैशन हो गए हैं। अगर कोई आपसे कहे कि आप तो जी बड़े सरल इंसान हैं , तो जी बोलने वाले की मिठास पर न जाएं ।दरअसल ये आजकल मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाने वाला बहुत ही सॉफिस्टिकेटेड पर्याय है!

पर फिर अगर चल रहा है तो क्या हम भी मान लें।और क्या सीधापन निरी मूर्खता का ही पर्याय है ? असल में क्या होता है कि ये महानुभाव बहोत बार सीधेपन को कोमलता से जोड़ लेते हैं जबकि होता इसके ठीक उलट है।

बेशक़ at that पर्टिकुलर मोमेंट ये एक बढ़िया सर्वाइवल टूल हो सकता है, इससे मुझे इंकार नहीं पर जो कहीं से भी मुड जाए टेढ़ा हो जाये और चूं न कसे , अपनी नाक की हड्डी की तरह!उसका क्या मज़ा? असल मज़ा तो मज़बूत टिबिया- फिबुला बनने में है जो टूट जाये पर लचकती नहीं है( गो कि हमारी वाक़ई में चटकी हुई है)

असल में क्या होता है न कि जिनकी मेजोरिटी होती है , वो अपना एक नरेटिव बना लेते हैं।, फिर बाकी भेड़ें क्या करती हैं ? वो उसे दुहराती हैं बें बें बें बस्स! न हो भरोसा तो किसी एक भेड़ को पकड़कर तौल लीजिए।ये भेड़ें हैं!जो मजबूत करती हैं किसी भी नरेटिव को और मुश्किल चीजें वो तो भई भेड़ों के भेड़पन के बस की नहीं होतीं।

बस यही कारण है कि चतुराई या टेढ़ापन इतना इन ट्रेंड है। जब लोगों में दम ही न हो सीधे जीने का तो लोग टेढ़ेपन के ही उपासक होंगे, और सीधेपन को मूर्खता मानेंगे।सच मानने में ईगो जो हर्ट होता है।

फिर ऐसे में क्या करते हैं वो? एक तरीका ये कि नैतिक लोगों को सीधा और मूर्ख कह कर टाल दें और दूसरा कि अनैतिकता को महिमा मंडित कर दें।पर होंगे तो दोनों ही मनोविनोद के साधन।क्या है कि सच ही सबसे लंबे समय तक टिकता है, हर मुलम्मे के घिसने के बाद भी।

तो जी अगर आप हम जैसे पहली कैटिगरी में आते हैं तो अगली बार मिल जाये कोई ऐसा बिंगो मैड ऐंगल्स ! कुरकुरे (टेढेमेढे) टाइप पर्सनलिटी तो जमा दीजिये एक सीधा 180° का हथौड़ा! अगर आप पूछें कि इसके दरमियाँ ?तो जी तब तक स्वस्थ रहें ! मस्त रहें और बेशक़ व्यस्त रहें!

( साहित्यिक प्रलाप के बीच मध्यांतर आवश्यक हैं !ऐसे भी दिल्ली विश्वविद्यालय इस तरह के ज्ञान का स्वीट – सार मिक्सचर है, कुछ ज्ञान गंगा प्रवाह इधर भी स्वाभाविक ही है।लाइव फ्रॉम डी. यू. लाइब्रेरी)

मांझे मांझे चलो रे पंथी! मांझे – मांझे!

नयापन क्या है ?शायद केवल एक भ्रम !कभी आप उस सीमा तक पहुचें तो महसूस कर पाएंगे कि नयेपन की हर कोशिश असल में पुराने का ही दुहराव है।तो फिर आप कहेंगे ये नयापन जो हम महसूस करते हैं वो क्या है ? तो मैं कहूँगी वो एक नए बिंदु से उसी घेरे का वापस दुहराव ही है। सिरे का नयापन छोर का नयापन तो नहीं होता न !इससे तो सहमत होंगे आप।पर क्या होता है जब हम नयेपन की थका देने वाली तलाश में निकलते हैं और बहुत घूम – फिरकर भी बार -बार वहीं पहुँच जाते हैं। इसकी पीड़ा कैसी होती है? वैसी ही शायद जैसे किसी पिंजरे में कैद पंछी की!जब तक हम उस सीमा तक नहीं पहुँचते सब कुछ सुंदर और भव्य लगता है पर वहां पहुचकर ही वो मज़बूत बेड़ियां नज़र आती हैं।बाबा की कही ये लाइनें जो शायद टैगोर की हैं ज्यादा तसल्ली देती हैं-

‘मांझे मांझे चलो रे पंथी, मांझे मांझे!’

सचमुच सबसे अच्छा तो मध्यमार्ग ही है अतिवाद हमें कहीं नहीं पहुचाते फिर चाहे वो अतिवाद नयेपन का ही क्यूं न हो ।

संरचनावादी यूँ ही तो नहीं कहते कि हम उतना ही बोल सकते हैं जितना समझ सकते हैं, और उसे ही पलट दें तो उतना ही समझ सकते हैं जितना बोल सकते हैं।क्या हुआ ? क्या आपने भी महसूस किया ?कितना संकुचित है तथकथित हमारा ज्ञान का व्यापार ! बुद्धि की ये सारी खीचतान ही भाषा की गिरफ्त में है।

पर फिर भी मुद्दे की बात कि हमारे आदमीपन की सीमा केवल हमारी बुद्धि नहीं है ।हमारी चेतना उससे कहीं बड़ी ,हमारी संवेदनशीलता उससे कहीं अधिक महनीय है।